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The Seventh Continent- a failure of modern society.

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Touching the fragile issues of moving, living, surviving and dying, yesterday I saw the first directorial debut of legendary Austrian Director Michael Haneke’s “The Seventh Continent”. The Seventh Continent, also known as a pure existentialist tale in cinema, released in 1989 is an Austrian Drama film inspired by a true story of an Austrian middle-class family that committed suicide.

Haneke is often associated with cinema’s great modernists, with the filmmaker like Bresson and Antonioni. Haneke’s films document the failures of modern society on a variety of levels.

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The Seventh Continent is highly disturbing film made with the peculiar style full of close-ups where instead of characters’ faces, we see their hands, movements, and actions, we listened to their view of the breakfast cereals, shoes, and shopping. It should be boring but is instead gripping, a quiet build-up to the tragedy to come.

This film is about a dull middle-class family in Linz, Austria that opts for collective suicide rather than continues to “live” within the constricting, anti-humane monotony of everyday bourgeois society. The Story is shown in a series of short scenes going about their daily life over several years. The husband is an engineer, the mother an optician who co-owns the business with her brother. They have a bright, a subdued little girl.

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In the opening half an hour, Haneke avoids the direct involvement of Viewer and character to make it more cathartic. But after this anthropological detachment, we get a clear view of their faces and are then disturbing hints that all is not well. The wife begins to cry as they are driving through a car wash – a family ritual – and the little daughter frighten a teacher at school by pretending to be blind.

Finally, it becomes clear that the family is coming to a terrifying decision about the dullness and futility of their lives, which is finally anatomised in the most spectacular way. Haneke allows us to suspect, little by little, what’s coming and the experience is genuinely terrifying: and it is also deeply troubling to retrace the film once it is over, trying to pinpoint what was really happening in the adults’ heads, and when.

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Haneke is a master of absurd, dull and this kind of drama where he is more concerned towards the process than the result. I don’t think there is any greater cinematic interpreter of alienation exists in the world today than Haneke.

Depicting monotonous actions like counting of money at a supermarket, the distractions of television, the meaninglessness of work, the film reflects the powerlessness and secludedness of people in modern society. Haneke chronicles a family enslaved to the structures they have created, operating in a morass of emotional vacuity.

The Seventh Continent is a tragic announcement of the demise of a civilization.

 

  • Gursimran Datla
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Wonders of Wim Wenders – “Paris Texas”

विम वेंडर्स की 1984 में आई “पेरिस,टेक्सास” 110 सालों से चले आ रहे अमेरिकी स्टाइल से बिलकुल परे की फ़िल्म है। अमरीका के टेक्सास में शूट हुयी और अंग्रेजी में बनी “पेरिस,टेक्सास”, विम वेंडर्स की तेहरवीं फिल्म है। वेंडर्स जर्मन के रहने वाले हैं और “पेरिस,टेक्सास” अमनेशिया का शिकार हुए टेर्विस की कहानी है जो 4 साल गुम रहने के बाद अपने घर लौटता है। कैसे वो अपने बेटे को पाता है, उसकी माँ को ढूँढने की कहानी और बाप बेटे के रिश्ते का गठन, यह “पेरिस,टेक्सास” का मूल है।
2 विश्व युद्ध देखने के बाद जर्मन बुरी हालात में रहा । लाखों लोग कभी घर को लौटे ही नहीं, और करोड़ों अपने सगे सम्बन्धियों का राह देखते रहे। विम भी 1945 में पैदा हुए और ज़ाहिर उन्होंने आस पास दूसरे विश्व युद्ध के बचे खुचे से जर्मन को खड़े होते देखा होगा।अक्सर बाल मनों पर त्रासदी का गहरा असर होता है और वह ता-उम्र रहता है।

 

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1966 में कॉलेज ड्राप आउट रहे वेंडर्स को पेरिस के मशहूर फ़िल्म संस्थान ‘ला फेमिस्’ में भी जगह नहीं मिली।फिर एक स्टूडियो के साथ जुड़े।
“पेरिस,टेक्सास” फ़िल्म 1984 के कान्स फ़िल्म समारोह में गोल्डन पाम अवार्ड हासिल कर चुकी है। विम वेंडर्स फ़िल्म सर्किल में ज्यादातर documentaries के लिए जाने जाते हैं। Room 666, Buena Vista Social Club इत्यादि उनकी सबसे चर्चित documentaries रही हैं।
“पेरिस,टेक्सास” फ़िल्म एक रोड मूवी की तरह है पर इसके हाशिये में एक आदमी के ख़लाअ की कहानी भी है। विम वेंडर्स ने बहुत ही नयूनतम बजट में फ़िल्म बनाई है और नए फिल्मकारों के लिये यह फ़िल्म किसी वर्कशॉप से कम नहीं है। वह इसके एक एक सीन को खोल कर काफी कुछ सीख सकते हैं। पिछले साल रिलीज़ हुयी रिचर्ड लिंकलेटर की boyhood भी जरूर Paris,Texas से कहीं ना कहीं प्रभावित रही होगी। मेहज़ 4 किरदारों से ढाई घंटे की फ़िल्म, वह भी सिर्फ इंसानी ख़लाअ पर आधारित, बहुत ही कलाकारी चाहिये भाई।
यह फ़िल्म, ट्रेविस नामी किरदार का एक मज़ेदार character study है जिसको लिखा है Pulitzer Prize जेतू नाटककार “सैम शेपर्ड” ने और इस किरदार को विश्वसनीय निभाया है Harry Stanton ने। Harry का चेहरा भी फ़िल्म में उसी लैंडस्केप जैसे व्यतीत होता है जिसमें पूरी फ़िल्म दौड़ती रहती है।
Wim wenders न्यू जर्मन सिनेमा के अग्र दूत रहे हैं और शेपर्ड के साथ उनकी यह फ़िल्म अमरीकी समाजवाद पर एक चुप चपिता कटाक्ष भी है। परिवार इस दौर में कहाँ खड़ा है? इच्छाएं और चिंताएं क्यों इंसान से ऊपर हो गयी हैं।
Robby Miller, जो के इस फ़िल्म के सिनेमेटोग्राफर हैं उनकी तारीफ भी बनती है। जिस सरलता के साथ उन्होंने कम्पोजीशन प्रस्तुत की हैं, वे कमाल हैं। वे शायद इकलौते सिनेमेटोग्राफर हैं जिन्होंने उस दौर के लगभग सभी इंडिपेंडेंट फिल्मकारों के साथ काम किया जैसे Lars von Trier, Jim
Jarmusch इत्यादि। पिछले साल ही अमरीकी सिनेमटोग्राफर्स की सोसाइटी ने उन्हें अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सन्मानित किया ।
40 साल के ऊपर के फ़िल्म कैरियर के बाद आज भी, विम वेंडर्स का जोश कम नहीं हुआ। वह आज कल 3D तकनीक के साथ एक आर्किटेक्ट पर डॉक्यूमेंट्री बना रहे हैं। इसे सिनेमा के जादू ही कहा जाए के यह फ़िल्म को बनाने वाले को भी बोर नहीं होने देता। पिछले साल की सर्वोत्तम फ़िल्म भी 3D फ़िल्म थी नाम था goodbye to language। जिसे निर्देशित किया था 85 साल के Jean-Luc Godard ने। सलाम सिनेमा तुझे…।

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Monsieur Lazhar – a silent art of storytelling.

आखिर क्या होती है फ़िल्म ! आखिर कर क्या जाती है फ़िल्म। क्यों हमारे पिछले गुज़र चुके बिम्बों को दुबारा हमारे सामने ला खड़ा करती है एक फ़िल्म ? क्या एक फ़िल्म वही है जो अचंभित कर देने वाली तकनीक से बनी हो ? या वो जो स्टोरी टेलिंग में घुमावदार मोड़ लिए ढाई घंटे बैठने का साधन हो वो ? अगर फ़िल्म समझ पाना इतना आसान होता तोह यह माध्यम कभी अपने आप में इतनी शक्ति न रखता। ना ही दुनिया के महान मुल्कों से फ़िल्म मूवमेंट जनम लेतीं और ना ही रोबर्ट ब्रेस्सों, एंटोनी, बर्गमैन इत्यादि फिल्मकार कभी कलाकार कहलाते। यह फ़िल्म ही थी जो इनके बाद भी इनकी बताई कहानियों को आज भी ज़िंदा रखे हुए है। खैर इस माध्यम पर पहले से बहुत कुछ लिखा जा चूका है, पर यहां मैं बात करना चाहूँगा 2011 में आई केनेडियाई फ़िल्म Monsieur Lazhar की। 84वें अकादमी अवार्ड्स में कनाडा की तरफ से फॉरेन केटेगरी में नॉमिनेट हुयी यह फ़िल्म फ्रेंच भाषा में बनी है।

 

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हम जीते क्यों हैं ? क्या इस लिए के एक दिन किसी घटनाक्रम का शिकार हो कर मारे जाएँ। फिर चाहे वो घटना 25 की उम्र में हो या 85 की। अंत तोह मौत है। लेकिन यह मौत अपने साथ पीछे क्या छोड़ जाती है ? शायद, बच गए लोगों के लिए अचरज, दुविधा या फिर मातम। आखिर हल क्या है ? हल है भी ? ऐसी ही अवस्था, ऐसे ही सवालों से दर्शक को दो चार कराती है Philippe Falardeau द्वारा निर्देशित कैनेडियन फ्रेंच ड्रामा फ़िल्म ‘Monsieur Lazhar’।
कथा यह है के मोंट्रियल इलाके के एक एलेमेंट्री स्कूल की एक टीचर ने क्लास में आत्महत्या कर ली है। 11-12 साल की उम्र के बच्चे इस मौत से अचरज में हैं। इस से पहले के उपरोक्त कारण से स्कूल बंद हो, स्कूल की प्रिंसिपल पढ़ाई जारी रखने के लिए एक नए टीचर को अप्पोइंट करती है। नया अध्यापक जो के अल्जीरिया मुल्क से आया एक रिफ्यूजी है और कनाडा में अस्थायी राजनितिक शरण में है। बिना उसके बारे कुछ ज्यादा जाने उसे अप्पोइंट कर लिए जाता है। बशीर का पूरा परिवार पीछे अल्जीरिया के दंगों में खत्म हो चूका है। वो अब कनाडा में सम्पूर्ण नागरिकता के लिए लड़ रहा है। परिवार के छूट जाने के मातम को दिल में समेटे Bachir Lazhar ( नया टीचर ) उन अचरज भरे दिलों वाले बच्चों से मुखातिर होता है। यहां उसका सामना उन बच्चों से है जो उस आत्महत्या से ख़ौफ़ज़दा हैं। यहां दो दुनिया का मेल है, एक तरफ जहां मौत अपनी मर्जी से लायी गयी है दूसरी तरफ हालात की वजह से आई मृतयु है।
यहां दाद देनी बनती है Philippe की जिन्होंने इतने संवेदनशील विषय को इतनी खूबसूरती और बिना मेलोड्रामे के गढ़ा, के देखने वाला उन बच्चों में खुद को देख पाता है क्योंकि हमने भी अपने खोये हैं और उन अध्यापक से relate कर पाता क्योंकि हम सब कहीं न कहीं शरणार्थी हैं।
यह फ़िल्म Évelyne de la Chenelière के one act play ‘ Bachir Lazhar’ पर आधारित है। Mohamed Saïd Fellag जो के अल्जीरिया के ही जाने माने कॉमेडियन और लेखक हैं, उनके द्वारा निभाया गया बशीर का किरदार बेहद सराहनिय है। एक कॉमेडियन को गंभीर किरदार निभाते देखना कमाल होता है। फ़िल्म अपने अंदर बहुत सूक्षम पल, किरदार और लम्हे लिए हुए है। जब आप उन बच्चों को देखते हैं, उन की जदो-जेहद को देखते हैं,तोह आप अपने स्कूल के समय में जा पहुँचते हैं।
एक रिफ्यूजी, जिसके परिवार को जला दिया गया हो, जो अपने वतन लौट नहीं सकता कैसे बिना टीचिंग के किसी एक्सपीरियंस के क्या बच्चों के मन से अचरज निकल पाता है, यह इस कथा का अत्यंत महत्वपूर्ण काव है। सिनेमा की रूह को पसंद करने वाले लोगों को यह फ़िल्म अवश्य देखनी चाहिये क्योंकि यह रूह से बनी फ़िल्म है और इस बात को भी झुठला देती है के आज के दौर में, पहले जैसे उम्दा निर्देशक नहीं हो सकते।
फिल्लीप की निर्देशक के तौर पे यह चौथी फ़िल्म है। एक इंटरव्यू में फिल्लीप कहता है के
“we have to let the teachers invest
in their own classroom . There ’ s no use in trying to control everything . Education is fundamental . The teacher will never be a parent . The parents are the parents . But they have to engage in some sort of active
education beyond just teaching mathematics and French and English because the kids spend more time there than they do with their parents at that age .I think we
should let the teachers do their work and not impose too much stuff on them”.

पूरा इंटरव्यू आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं –
collider.com/philippe-falardeau-monsieur-lazhar-interview/…/

Gursimran Datla

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Cinema, Aspirins and Vultures – a Brazilian masterpiece

12628486_10205214757590812_7066068874899290663_oमार्सेलो गोमेज़ की “Cinema, Aspirins and Vultures” 2005 में आई ब्राज़ीलियाई भाषा की फ़िल्म है जिसे उस साल कान्स समारोह में दिखाया गया। यह एक रोड मूवी है। अपने ट्रक पर Aspirins बेचते एक जर्मन युवा “जोहान” की कहानी है जो ब्राज़ील की गरीबी से जूझ रही जनसँख्या को एस्पिरिन इस्तेमाल करते लोगों की फ़िल्म दिखा कर अपनी दवाई बेचता है। जोहान फ़िल्म प्रोजेक्शनिस्ट है और एस्पिरिन सेलर भी। दरअसल प्रपोगंडा फ़िल्म दिखा कर वो लोगों को aspirin के फायदा बताता है और फिर बेचता है।
फ़िल्म का समय काल 1942 का है जब विश्व युद्ध में जर्मन, जंग से जूझ रहा था। जोहान को जंग पसंद नहीं थी, और वो किसी के मौत का कारण नहीं बनना चाहता था। सो उसका वापिस जर्मन लौटना मौत के बराबर था। अब वो उत्तरी पूरब ब्राज़ील में घूम घूम कर एस्पिरिन बेच रहा है। उसके अनुसार भूख से मरना जंग में मरने से ज्यादा अच्छा है।
ब्राज़ील भूखमरी और गरीबी से जूझ रहा है जहां लोग पलायन कर रहे हैं। सफ़र के दौरान जोहान को एक ब्राज़ीलियाई युवा मिलता है, जो बेरोज़गार है और “रियो” जाना चाह रहा है। पर वो कुछ पैसों के बदले जोहान का असिस्टेंट बनने को राज़ी हो जाता है और फ़िल्म प्रोजेक्ट होते देख बहुत खुश होता है। वो कहता है “सिनेमा तोह ऐसे दिखता है, जैसे इसे दिखाकर तुम शैतान को भी बाइबिल बेच सकते हो”।
फ़िल्म के साथ साथ ट्रक भी आगे बढ़ता जाता है। जंग और बदत्तर होती जाती है। फ़िल्म जीवन के कई पहलुओं पर से हो कर गुज़रती है। जैसे जंग, बिमारी, भुखमरी, डर, मौत, सेक्स, जीत, जोश, उम्मीद इत्यादि।
फ़िल्म आखिर तक पहुँचती है के नायक के सामने एक अंतर्द्वंद्व छिड़ जाता है। अगर वो जर्मन लौटता है तोह जंग में मारे जाने का डर और अगर “रियो डे जनेरो” जाता है तोह गुलामों के कैंप में झोंक दिया जाएगा।
फ़िल्म का अंत दुखद पर बहुत भावपूर्ण है।
जोहान, ब्राज़ीलियाई युवक को कहता है के सोचो हम दोनों जंग के मैदान में एक दूसरे के दुश्मन हैं तोह क्या तुम मुझे मारते ? यह सीन विश्व सिनेमा में फिल्माए गए कमाल के सीनों में से एक है। उसके बाद दोनों अपनी अपनी किस्मत को लेकर आगे बढ़ते हैं और फ़िल्म जिस ease के साथ शुरू होती है, उस से कहीं ज्यादा सवाल देकर चली जाती है।
फ़िल्म को 2007 के अकादमी अवार्ड्स के लिए ब्राज़ील की तरफ से नामांकित किया गया था। मेरा ऐसा मानना है के दक्षिण अमरीकी सिनेमा के साथ अवार्ड्स के मामले में हमेशा से अन्याय हुआ है। अर्जेंटीना, चिली, पैराग्वे और वेनेन्ज़ुला से कमाल की फिल्में निकली हैं जो किसी भी मामले में फ्रेंच और अमेरिकन फिल्मों से कम नहीं है।
फ़िल्म के दोनों किरदार हालातों से भाग रहे हैं। एक जंग से दूर रहना चाहता है और दूसरा अपनी गरीबी से भाग रहा है। ट्रक सबसे बड़ा मेटाफर है। ब्राज़ीलियाई युवान फ़िल्म में एक जगह कहता है के “पूरी दुनिया जंगों से जूझ रही है और हम यहां पूरबी ब्राज़ील के खाली गाँव में घूमकर मज़े कर रहे हैं”।
खैर, मार्सेलो गोमेज़ की बतौर निर्देशक यह पहली फ़िल्म थी। इसके बाद उसने कुछ और फिल्में भी बनायीं। इस फ़िल्म के बाद मैं जरूर उनको देखना चाहूँगा।

– Gursimran Datla

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Bergman’s last Episode of Isolation – The passion of Anna

Bergman s ‘The passion of Anna’ is a remarkable portrayal of self realisation that captures the contradictions in human relations enmeshed between various truths and lies.
It is very difficult to describe the brilliance of this cine-craft in few words and it is rather a difficult film in which Bergman uses various deconstructionist devices.
Made in 1969, this Swedish drama film is the third film in the trilogy of “Island Trilogy”, alongside Hour of the Wolf(1968) and Shame (1968) all these films has been plotted on the backdrop of human Tragedy , Social prejudices and betrayal. The most isolated, though not necessarily detached, character is Andreas Winkelman (Max von Sydow), in this only colour film in whole trilogy, ‘Max’ looks younger than his age. For the role of ‘Anna’, Bergman chose ‘Liv Ullmann ’ who is compeer of Bergman. Bergman’s films are imperfect without Liv. When the film reach its climax, Liv’s deep blue eyes and red scarf will retained in your memory for a long time. This film can be remembered for Liv’s stark portrait of trauma and spiritual fatigue.

 

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Another familiar face from Bergman’s films, Bibi Andersson played ‘Eva’ in this film. ‘Eva’ lives in the shadow of her husband, longing for security and identity, which she searches for in an affair with Anna’s husband and in a fling with Andreas. Andreas lives in isolation, hiding from the world to wallow in his humiliation and fear. As these lives become entangled, their fragile relationships are shattered. ‘Erland Josephson’ portrays the role of Eva’s husband ‘Elice’ who is a professional photographer. ‘Elice’ is aware of the intimacy among Eva and Andreas but prefers to act ignorant about the relation between them.
Bergman exploits the expressive possibility of cinema, which is noticeable in his use of colour, theme, and the frame. Film has been shot in a small island in Sweden, at this place; Bergman spent his most of his life. Film manages to give a pause to its primary Narrative structure while several other sub plots are also introduced in the script. Bergman makes the whole narrative more unconventional by making his actors introduce the characters they are playing in the film by interviews and other unconventional means. Bergman has also used footage from his previous film of trilogy, ‘shame’ as a dream sequence.

Bergman uses the witness of Vietnam War atrocities as a potent symbol of collective guilt, shame, and anguish at the violence of the world. A madman on the island whose random violent acts provide a sense of mystery, tension and disquiet. Andreas rescues a puppy hanging from a noose, sheep are butchered, and a horse is set on fire. Violence besieges Bergman’s characters, who fail to transcend it in their own relationships. These sub plots within the main narrative, captures the psychology of various characters.

Andreas and Anna who were living together, later decides to separate. Good and evil characters are only mere perceptions. A person who performs his role pretty well in given circumstances, is judged good or bad accordingly.
The Passion’s finale is an influential emotional and thematic summary accomplished in one excruciating long take. Its enigmatic ending suggests that Bergman did not leave questions of God behind when he finished The Silence (1963), as he claimed. Instead The Passion is both a depiction of secular despair and a final appeal to a silent God.
In 1971, in an interview, Bergman agreed that his idea of using deconstruction plot in this film is not an effective idea. He is not happy with that. He believes that the actors didn’t perform well in those interview scenes. This film remains one of the greatest films ever made despite of these words. ‘Liv’ and ‘Max’ were also paired together in the previous two films of this trilogy. Their relationship become multifaceted in this last part. The psychological and physical violence of modernity; of human relations; of war; and of detechment, is the ultimate context for each character’s past trauma, present desperation, and future isolation.

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We should also appreciate Sven Nykvist for his breathtaking cinematography. As per Sontag: “Our eye cannot wander about the screen, as it does about the stage. The camera is an absolute dictator. It shows us a face when we are to see a face, and nothing else; a pair of clenched hands, a landscape, a speeding train…only when it wants us to see these things. When the camera moves we move, when it remains still we are still.”
So, More than a filmmaker, Bergman was a magician. The Passion’s final scene exemplifies Bergman’s mastery of cinema’s expressive potential. He combines framing, movement, gesture, dialogue, expression, sound, and colour to create images of intellectual and emotional resonance that inhabit our daydreams and haunt our nightmares.

( I am thankful to Xenia Feldman and Harish Mehla, who helped me to translate this blog post from Hindi to English)

– Gursimran Datla

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Kiarostami – gray sorrow in between.

किआरोस्तामी नही रहे।
वो अपने साथ उन हवाओं को भी ले गए जो विस्फोटों के साये में खड़े बर्फ और मिट्टी के पहाड़ों से आती थीं। वो उन आवाज़ों को भी ले गए जो चाहे कभी कभार ही, पर खालिस और कच्चे गलों से निकलती थीं।
वो उन चेहरों को भी ले गए जो अपनी गालों पर सदियों की बेरहम मारों को झेले हुए थी।

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किआरोस्तामी चले तोह गए पर पीछे बहुत सारी धरोहर छोड़ गए। छोटे छोटे बीजों को फूल होने तक का बाजरा छोड़ गए ।पानी छोड़ गए ।

कल जरूर किआरोस्तामी Taste of Cherry के उसी ट्रक में सवार हुए होंगे और ऐसे ही मृत्यु को ढून्ढ रहे होंगे। या certified copy सरीखे अपनी हमनवा संग सवार जहां भर घूम रहे होंगे। जूलिएट मिनोज़ ने क्यों काम किया होगा उनके साथ ? क्योंकि … वो किआरोस्तामी थे।

तमाम फिल्मकारों की तरह किआरोस्तामी भी कैंसर से मरे। उनका मरना हुआ तोह कुछ बेहतरीन दिमागों को आज पता चला के किआरोस्तामी कौन था।ऐसा कौन आदमी था ?

Iranian filmmaker died at 76।
Google पर Abbas Kiarostami लिखने से यही लिखा हुआ आ रहा है पहले।

किआरोस्तामी चले गए हमें छोड़ गए सर्टिफाइड कॉपियों के साथ, साथ ले जाने वाली हवा के साथ। क्लोज-उप के साथ। जैतून के पेड़ों साथ । लैला, शिरीन औए केलिद के साथ। हम छोड़ गए यह ढूँढने के लिए के मेरे दोस्त का घर कहाँ है। ओह किआरोस्तामी ! अब दोस्त नहीं मिलते।

तुम्हारी इन पक्तियों के साथ तुम्हें नमन –

Morning is white,
evening is black,
a gray sorrow
in between.

عباس کیارستمی (Abbas Kiarostami),گرگی در کمین / A Wolf Lying in Wait

– Gursimran Datla

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Kiarostami – gray sorrow in between.

किआरोस्तामी नही रहे।
वो अपने साथ उन हवाओं को भी ले गए जो विस्फोटों के साये में खड़े बर्फ और मिट्टी के पहाड़ों से आती थीं। वो उन आवाज़ों को भी ले गए जो चाहे कभी कभार ही, पर खालिस और कच्चे गलों से निकलती थीं।
वो उन चेहरों को भी ले गए जो अपनी गालों पर सदियों की बेरहम मारों को झेले हुए थी।

किआरोस्तामी चले तोह गए पर पीछे बहुत सारी धरोहर छोड़ गए। छोटे छोटे बीजों को फूल होने तक का बाजरा छोड़ गए ।पानी छोड़ गए ।

कल जरूर किआरोस्तामी Taste of Cherry के उसी ट्रक में सवार हुए होंगे और ऐसे ही मृत्यु को ढून्ढ रहे होंगे। या certified copy सरीखे अपनी हमनवा संग सवार जहां भर घूम रहे होंगे। जूलिएट मिनोज़ ने क्यों काम किया होगा उनके साथ ? क्योंकि … वो किआरोस्तामी थे।

तमाम फिल्मकारों की तरह किआरोस्तामी भी कैंसर से मरे। उनका मरना हुआ तोह कुछ बेहतरीन दिमागों को आज पता चला के किआरोस्तामी कौन था।ऐसा कौन आदमी था ?

Iranian filmmaker died at 76।
Google पर Abbas Kiarostami लिखने से यही लिखा हुआ आ रहा है पहले।

किआरोस्तामी चले गए हमें छोड़ गए सर्टिफाइड कॉपियों के साथ, साथ ले जाने वाली हवा के साथ। क्लोज-उप के साथ। जैतून के पेड़ों साथ । लैला, शिरीन औए केलिद के साथ। हम छोड़ गए यह ढूँढने के लिए के मेरे दोस्त का घर कहाँ है। ओह किआरोस्तामी ! अब दोस्त नहीं मिलते।

तुम्हारी इन पक्तियों के साथ तुम्हें नमन –

Morning is white,
evening is black,
a gray sorrow
in between.

عباس کیارستمی (Abbas Kiarostami),گرگی در کمین / A Wolf Lying in Wait

– Gursimran Datla