cinema · film · Uncategorized

Why there are no Bressons, Truffauts, Tarkovaskies and Bergmans anymore ?




The thought behind this article started last Saturday when one of my filmmaker friends asked me a question, in between the conversation on cinema and contemporary filmmakers.

He asked –

Why there are no great storytellers anymore?

Because there are no great lovers anymore.

I replied.

He looked at me and started thinking about it.

So I came home and note down the points which I think are obstacles in the path between films and filmmakers of the current generation.

Here are a few points I think which are the reasons why we don’t have that kind of remarkable storytellers today –

1 – Today – filmmakers have no opinion.

Today’s filmmakers want to play safe. They need money. so they work diplomatically. They don’t want to hurt anyone. They want to be in good books of everyone. They need funds.



They appreciate government and officials, they didn’t resist to their policies, they don’t fight back. Moreover, today’s filmmakers don’t know the reason why they are creating certain stories.

Whereas a storyteller needs to question the contemporary times, environment and society. French filmmaker Jean-Luc-Godard influenced the whole narrative cinema by starting a different wave called french new cinema. He was a true rebel. He thrashed all the technology of so-called studio cinema and invent handheld camera technology. what Godard is to Cinema is what Joyce was to literature and the cubists were to painting. He saw a rule and broke it. Every day, in every movie.




Here is a great link to case study in Godard Cinema –

2 – Today – filmmakers are frightened.

They don’t dare to touch controversial subjects, they get frightened by the particular community, fear of getting banned and caught by police as well as insecurity at the box office. These are the great threats for today’s filmmakers.

They didn’t go all the way to prove their perspective and neither they care about their perspective. And a filmmaker without perspective is a filmmaker wasted. Robert Bresson’s films are a great example of how to use film as a form to narrate your expression to the viewer, without letting them emotionally attached to it. His films are the great example of reflective art.

Here is the link to an essay written by Susan Sontag on the “Spiritual Style in the Films of Robert Bresson” –



3 – Today – All they care is – technology


maxresdefault (1).jpg

Today’s filmmakers spend all their time knowing and updating their anxiety about technology. They have all the information regarding new cameras, tech shows, audio recorders They want to have all the latest equipment but on the other end, they can’t justify their own films, their own film’s shots, and camera movements. They have one reason for that – It looks good.
Beautification and high color grading are killing the essence of cinema.



Swedish filmmaker Ingmar Bergman spend all his life on an Island making films, theater plays and reading. He doesn’t have access to drones and goes pros. Believe me, cinema is much simple.

Here is a link to youtube, a beautiful essay exploring the themes of dreams in Bergman’s minimalist movies –

Today – filmmakers are ‘seller’.

today’s filmmakers spend all their energy in writing grants, impressing producers, giving pitches and attending unwanted film workshops. They present their idea as a product and also open space to manipulate it as producer demands. All they want is to sell their stories.



They want to make “Beautiful shots”

Color correction and Auto-mode on camera are blessings for filmmakers. Now they capture clean neat beautiful shots with high color grading techniques. Naturally, more than the story you see the production value and camera movements.

people still get awestruck by the eight-minute long take in ‘weekend’ movie directed by Godard. Where as Fellini’s La Strada is an epic example of creating the story in an ill-designed world?

Today – filmmakers make noise not sound.

To make their film rich and costly, they try everything. They want to impress everyone. The filmmaker never makes a film to impress anyone, he challenges society. The film should challenge rich and show solidarity with oppressed people.

Quoting Tarkovsky – “Never try to convey your idea to the audience – it is a thankless and senseless task. Show them life, and they’ll find within themselves the means to assess and appreciate it.”
The filmmaker never makes a film to impress anyone, he challenges society. The film should challenge rich and show solidarity with oppressed people.


o48gk4ohmhspBsilViH5zBs (1)

So, I will close this article with some fantastic lines by Andrei Tarkovsky. This quote is an excellent answer to what is cinema, why it is not just a medium of entertainment and why do we go to Cinema.





  • Gursimran Datla
cinema · film · greatest directors · Uncategorized

Good morning, night – why can’t they rebel ?

1978 में इटली के इतेहास में वो समय आता है जब अल्डो मोरो ( प्रधानमन्त्री ) कुछ वामपंथी क्रांतिकारियों द्वारा बंदी बना लिया जाता है । लाल ब्रिगेड करके जाने जाती इस क्रांतिकारी फ़ौज ( जो के खुद को कम्युनिस्ट भी कहती है ) ने अल्डो मोरो के कई साथियों को मौत के घात उतार दिया। जब इस ब्रिगेड की जरूरतें नहीं मानी गयीं तोह उस प्रधानमन्त्री को भी मार दिया गया।
इसी ब्रिगेड की एक औरत मेंबर ‘चिअरा’ खुद को दो राहे पे खड़ा पाती है जहां वो क्रान्ति और आतंक के बीच का फर्क समझने की कोशिश करती है। Good morning, night इसी सवाल की कहानी है।

2003 में रिलीज़ हुयी इस इटालियन भाषा की फ़िल्म को निर्देशित किया है मार्को बेल्लूच्चिओ ने, जो इस से पहले “फिस्ट इन द पॉकेट” नाम की फ़िल्म से जाने जाते हैं।



1978 तक इटली में लगातार 30 साल तक Christian-Democratic party (DC) का दबदबा रहा और Communist Party (PCI) को 1947 में ही सत्ता से बाहर कर दिया गया। उसके बाद हर साल 1970 तक PCI का वोट बैंक बढ़ता गया और यह इटली की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी। 70 तक लोग DC से परेशान होने लगे, उनके बदलाव की जरूरत महसूस होने लगी और वो PCI को विकल्प के तौर पर देखने लगे जो के कम्युनिस्ट विचारधारा रखती थी।

लेकिन ना ही तोह US और ना ही DC यह चाहती थी के PCI सत्ता में आये, उसकी विचारधारा के चलते।

अल्डो मोरो को बंदी बनाने के पीछे एक कारण यह भी रहा के वो DC और PCI के बीच एक पुल का काम कर रहे थे और लाल ब्रिगेड को यह ग्वार नहीं था। तोह मोरो के किडनैप होने पर सबसे ज्यादा ख़ुशी DC में ही मनाई गयी क्योंकि पूंजीवादी सरकार किसी भी हालात में साम्यवादी सरकार नहीं चाहती थी।
वो जहां मानवीय संवेदना और सामूहिक विचारधारा के प्रति वफादार होना चाहती थी वहीँ उसकी अपनी लाल ब्रिगेड, Working class के हाथ में सत्ता थमाने में विश्वास रखती थी। उनको क्रान्ति से ज्यादा विचारधारा से प्यार है।
सत्ताधारियों और दक्षिणपंथी लोगों पर अक्सर इतेहास से छेड़छाड़ करने के इल्जाम लगते रहे, क्या मार्क्सवादियों ने अपनी क्रान्ति के लिए कभी इतेहास को नहीं जोड़ा- तोड़ा ?

एक क्रांति क्या किसी एक सिद्धांत के साथ जुड़ाव रखने से हो सकती है ? क्या एक विचारधारा के प्रति वफादार होना क्रांति कहलायेगा ?
हर क्रान्ति अपने साथ बहुत सारा खून और लाशें ले कर आती है।यह हमने पिछले सदी में देखा। जीवित लोग मृत में तब्दील हो जाते हैं। ऐसे में क्रांतिकारी होने के लिए क्या चाहिये ?
क्रान्ति और आतंक में क्या फर्क है ?

क्या अब हम दुबारा किसी और क्रान्ति को झेल पाएंगे। हमने तोह कब्रें बनाने/लाशें जलाने की जगह तक नही छोड़ी। उसपर भी appartment खड़े कर लिए।

क्या सिर्फ नीचले तपने के/ या फिर मजदूर वर्ग को ही विद्रोह करने का अधिकार है ?
हम जिस पार्टी/विचारधारा के हैं क्या उसी से विद्रोह कर सकते हैं ?

हर कोई मरता है, पर सब का मरना एक सा नहीं होता। किसी की निर्णायक होती है तोह कोई बस, मर जाता है।

बचपन में हम सब बहुत धार्मिक होते हैं। धर्म एकता का पाठ पढ़ाता है, जैसे जैसे हम बड़े होते हैं हम देखते हैं के सबसे ज्यादा एकता का खंडन मज़हबी इलाके में ही होता है। तोह 25 तक आते आते मज़हब छूट जाता है। मरणो उपरान्त जन्नत/heaven का सिद्धांत भी सभी धर्मों में है। यह मानव मन में डर को बनाये रखता है।

आज एक मानव इसलिए जीवित है क्योंकि दुसरे मानव के मन में भय है। नहीं तोह कब से अपने साथ वालों को खत्म कर चुके होते।

Gursimran Datla

cinema · film · gursimran datla · Uncategorized

Hungarian Cinema – समाजवाद और विरासत



विश्व सिनेमा में हंगरी के सिनेमा की अपनी एक विरासत रही है। 1950 से 1960 के दौर को हंगरी सिनेमा का सुनहरी दौर कहा जाता है , और यह भी चर्चित है के उस दौर के बाद, बहुत जल्द हंगरी सिनेमा ध्वस्त हो गया लेकिंग अब बन रही हंगरी की फिल्मों के बिम्बों पर उस समय की समाजवादी विचारधारा आज भी कायम है। हंगरी की तरह ही इसके सिनेमा का दौर भी वैसा ही रहा। कठिनाईयों से भरा।
1968 में समाजवाद के दौर में आई हंगेरियन हिस्टोरिकल फ़िल्म “Stars of Eger” कामयाब मानी जाती है। इस फ़िल्म में तुर्क राज़ के अधीन हंगरी की व्यथा को दिखाया गया और तुर्की और हंगरी के बीच के युद्ध का भी वर्णन हुआ .जहां युद्ध में औरतों द्वारा दुश्मन फ़ौज़ पर उबलता पानी और गर्म मोम डाल कर उनको भगाया गया।

इसके साथ ही Istvan Szabo की 1981 में आई Mephisto फ़िल्म सबसे चर्चित हंगेरियन फिल्मों में से एक है। यह पहली अकादमी अवार्ड फ़िल्म भी है। यह फ़िल्म विश्व युद्ध जर्मनी के आस पास बुनी गयी।



हंगरी में सिनेमा का सुनहरी दौर और फुटबॉल का सुनहरी दौर भी साथ साथ चले। उसकी puskas Hungary नाम से , हंगरी के बड़े फुटबॉलर पर फ़िल्म बनी।

जब जब विश्व के महान फिल्मकारों का नाम आये उसमें mikos jancso का नाम जरूर आएगा। 1967 में आई The Red and the white, 1972 में आई Red Psalm हंगेरियन सिनेमा को प्रभाषित करती हैं।

युद्ध त्रासदी और अन्याय को दिखाने के लिए हंगरी के फिल्मकारों ने कॉमेडी को भी माध्यम बनाया। इस मकसद से कई हंगरी की फिल्मों में ताने और विडम्बना आम नज़र आती है। सबसे अच्छी example रहेगी peter Bacso की The Witness, जो के उस दौर के समाजवाद पर एक कमाल का व्यंग्य थी।

हंगरी के सिनेमा की बात Bela Tarr की फिल्मों के बिना अधूरी है। रूसी फिल्मकार आंद्रेई तारकोवस्की के बाद अगर किसी निर्देशक ने वो स्थान हांसिल किया है तोह वो है Bela Tarr। 1994 में आई Satantago 450 मिनट लंबी फ़िल्म है जो के पूरबी यूरोप में समाजवाद के पतन पर आधारित थी। Almanac of fall, Werckmeister Harmoniak, The man from London जैसी फिल्में भी Bela Tarr की देन हैं।

1960 से 1970 का दौर हंगेरियन सिनेमा के लिए नयी ख़ुशी ले कर आया । नयी सोशलिस्ट सरकार ने फिल्मकारों कलाकारों को कई प्रकार की कलात्मक छूटें दीं। फ़िल्म स्टूडियोज पर फिल्मकारों ने अपनी धाक जमानी शुरू की जिससे फ़िल्म विशुद्ध कला के रूप से बन पाये। तकनीक सस्ती होती गयी, सेंसर ने भी कम फिल्मों को सेंसर करना शुरू किया तोह लोगों की भी सिनेमा घरों में आमद बढ़ी। हंगरी के सिनेमा में नौजवानों को बढ़ावा देने में ‘balazs bela studio’ की भी ख़ास भूमिका रही जिसने कई नए फिल्मकारों को मौका दिया।



उस दौरान हंगरी का सिनेमा पश्चिमी आधुनिकतावाद से प्रभावित रहा लेकिन उसके साथ चेक सिनेमा, पोलिश सिनेमा और फ्रेंच सिनेमा से भी कुछ तकनीक और narrative styles को follow किया गया।

आज के वक़्त में अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में पहुँच रही कई हंगरियन फिल्मों ने वहाँ के सिनेमा को दुबारा जीवित किया है। इस साल हंगरी की फ़िल्म “son of saul” को ऑस्कर अवार्ड मिलना इस मुल्क के सिनेमा के लिए रहत की बात है। फ़िल्म प्रेमियों और इंडिपेंडेंट फ़िल्म कंपनियों की नज़र अब हंगरी के सिनेमा पर है।


Click here to Read my article on ‘Son of Saul’.



Gursimran Datla



cinema · film · greatest directors · gursimran datla · Uncategorized

चेक सिनेमा और व्यक्ति प्रेम -The Joke

The Joke, 1969 में आई एक महत्वपूर्ण चेकस्लोवाकियन फ़िल्म है जो ‘चेक न्यू वेव’ सिनेमा आंदोलन की आखरी फिल्मों में से एक है। यह फ़िल्म चेक सिने इतहास में एक मील का पत्थर है जो अपनी सिनेमेटोग्राफी और सम्पादन की कला के कारण विश्व की सर्वोत्तम फिल्मों में शामिल है। फ़िल्म,स्टालिन के दौर में साम्यवाद ( कम्युनिज्म) में मौजूद दोगलेपन और खोखली व्यस्था के तत्वों को बड़ी ही सूझता से परदे पर उतारती है।
फ़िल्म ‘मिलान कुंदेरा’ के नावेल पर आधारित है और फ़िल्म के निर्दर्शक हैं ‘जेरोमिल जिरेस’ ।


यह फ़िल्म 1968 में बनी जो के स्लोवाकिया में creative freedom का आखरी साल था। उसके बाद वहां मिल्ट्री राज लग हो गया और यह फ़िल्म लगभग बीस सालों तक सिनेमा हॉल का मुंह नहीं देख पायी।
‘लूडवीक’ नामी अधेड़ उम्र का अविवाहित व्यक्ति अपने छोटे से नगर लौटता है जहां वो communist revolution के समय के दौरान, हड़तालों और क्रान्ति के नारों की आवाज़ों के बीच पला बढ़ा।
उस नगर पहुँचने पर उसे 15 साल पहले का वाकय याद आता है जब उसे कम्युनिस्ट पार्टी से क्रान्ति के विरोध में चिठ्ठी लिखने की सज़ा में पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया था। दरअसल वो चिठ्ठी एक प्रेम पत्र था जो लूडवीक ने एक लड़की के लिए लिखा था, जो के उसी पार्टी की कार्यकर्त्ता थी ।
वो उस लड़की से सेक्स करना चाहता था। लेकिन लड़की काम से ज्यादा राजनीती से प्रेम करती थी।
फ़िल्म के निर्देशक जेरिस उन घटनाओं को दिखाने के इरादे से फ़िल्म बनाते हैं जो स्टालिन के आर्डर ना मानने वालों पर तषदद को दर्शाते हैं। “The joke” बिकुल सीधे प्रत्याग और उपहास की कहानी है जो आम नागरिकों को धक्के से जेल में डालने की गाथाओं से भरी है।

15 साल बाद (मौजूदा समय) लूडवीक की अचानक मुलाकात उसे सज़ा सुनाने वाले आदमी की बीवी से होती है। अब पाला इसकी तरफ है। यह उस से इश्क़ लड़ाता है।

The Joke ऐसे कई व्यंग्यों से भरी पड़ी है, आज़ादी के गाने की ऑडियो चलती है, मज़दूर के विसुअल्स के साथ चलते हैं। ऑडियो में समर्थ, ख़ुशी और आज़ादी की ध्वनियाँ सुनाई दे रही हैं, चित्रों में लेबर कैंप और फ़ौज की जेलों के बिम्ब चल रहे हैं।
कुल मिला के यही हालात जैसी अब भारत की है। जो हिंदुस्तान की मौजूद स्थिति है वो भी किसी व्यंग्य से कम नहीं है। टॉलरेंस, इनटॉलेरेंस, देशभक्त इत्यादि।
फ़िल्म में इंटेरकट्टिंग तकनीक से इस्तेमाल हुए दृश्य कमाल के हैं जो फ़िल्म को बांधे रखते हैं।
चेक सरकार कैसे अपने ही नागरिकों का शोषण करती रही यह बेहतरीन है।
लूडवीक का अपने पुराने उमदराज हो चुके दोस्त से मिलना, जो 20 साल की लड़की से प्रेम सम्बद्ध रखे हुए है, The Joke, चाहत और सच्चाई पर तगड़ा व्यंग्य है। फ़िल्म लौकिक दृष्टि से बुनी गयी है जहां समय को एक विस्तार दिया गया है।
कम्युनिज्म और मिल्ट्री राज के साथ साथ फ़िल्म एक अस्तित्ववादी परिभाषा भी गढ़ती जाती है जैसे बदला ना ले सकने की हालात में इंसान का समय को भोगना, बिना समझे कुछ भी नहीं मानने का जोखिम और सच्चाई का पक्ष लेते लेते लोगों से दूर होने की पीड़ा।
इस फ़िल्म में बहुत कुछ है जो मानवी संवेदना और दर्द की कहानी कहता है जो विश्व के किसी भी आदमी के साथ घटित हो सकती है। यही बात इस फ़िल्म को सरब व्यापी बनाती है ।
फ़िल्म के निर्दर्शक जेरोमिल जिरेस व्यंग और अनुभूति वाला सिनेमा रचने में माहिर हैं।
फ़िल्म की लिखाई कमाल की है। जैसे एक सीन में कहा हैे के “आज को भरपूर जीने के लिए इतहास के जख्मों को याद रखना चाहिये ” या फिर “जीवन में की गयी चलाकियां कई बार घूम कर खुद पर ही आ पड़तीं हैं।”
1965 से 1968 के साल चेक सिनेमा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण रहे । जहां इस दौरान जबरदस्त सिनेमा बना वहीँ पर चक न्यू वेव भी लेहर भी दौड़ी। “वेरा चयतिलोव” की ‘daisies’ इस दौर की महत्वपूर्ण फ़िल्म है। इस के साथ साथ “जिरी मेंजेल” की ‘capricious summer’ भी देखने लायक है।
जाते जाते फ़िल्म का एक डायलाग जो आज के समय पर पूरा फिट बैठता है –

“We lived in a prison with brass bands playing on the balconies.”


– Gursimran Datla

cinema · film · greatest directors · gursimran datla · Uncategorized

A Borrowed Identity- पहचान और प्रेम का सहास्तित्व

जब आप यह फिल्म देख रहे होंगे तोह पूरा चांस है के आपको इस फिल्म की अभिनेत्री डेनियल कित्सिस से प्यार हो जाए, और फिल्म के अंत तक उस से एक घृणा सी होने लगे. किसी भी अभिनेता के लिए ऐसा करैक्टर स्केच गढ़ना बहुत मुश्किल का काम है और ऐसे ही किरदारों से भरी है ‘इरान रिक्लिस’ की इसरायली भाषा की बनी फिल्म ”A Borrowed Identity”.

Layout 1

2014 में आई ‘A borrowed identity’, ‘Dancing Arabs’ नाम के नोवल पर आधारित है और कहानी 1982 से 1995 के संधर्भ से है. यहूदियों और अरबियों के बीच के टकराव से उपजे दो प्रेमी और दो दोस्तों के बीच के संबंधों की कहानी है . दिमाग से होशेयार इयाद ( जो के अरबी है ) उसे फलस्तीन इजराइल के सबसे बड़े यहूदी बोर्डिंग स्कूल में पढने का मौका मिलता है, उसका पिता भी कभी बहुत पढ़ा लिखा था लेकिन अब वो अलगाववादी बन चूका है, इयाद को अपने पिता से शिकायत है के इतना पढ़े लिखे होने के बावजूद वो अपने जीवन स्तर को क्यूँ नहीं सुधार पाया.

यहूदी स्कूल में इयाद की मित्रता अपने जैसे ही एक लड़के जोनाथन से होती है, जो के यहूदी है और शरीरक रूप से चल फिर नहीं पाता. दोनों की मित्रता गाढ़ी होती चली जाती है और दूसरी तरफ  इयाद को अपनी ही क्लास में पढ़ती यहूदी लड़की ‘इदना’ से प्यार हो जाता है .

निर्देशक इरान रिक्लिस ने कहीं भी फिल्म को भावनात्मक ना रख कर व्यंगभरपूर रखा है. यह भी आज के दौर का विरोधाभास है के फलिस्तीनी मुद्दों पर ज्यादा फिल्में यहूदी निर्देशकों ने बनायीं. और फलिसितिनी निर्देशकों ने भी यहूदी मानसिकता को मानवीय स्तर पर समझा.
फिल्म आज के माजूदा हालातों कर भी गहरा कटाक्ष करती है. सद्दाम को पसंद ना करने वाले भी अब सद्दाम को पसंद करने लगे है हैं और चाहते हैं के अम्रीका इराक को छोड़ दे. अब उनको सद्दाम के नयूक्लेर हथियारों की याद आने लगी है.क्यूंकि उनको लगता है के शायद सद्दाम अम्रीका को भगा देने में समर्थ है। इयाद के प्रेम में ग्रिफ्तार ‘इदना’ को उसकी  माँ ने बोला है के तुम्हें कैंसर है,तुम लेस्बियन हो , कोई ऐसी खबर सुना देना पर यह खबर न सुनाना के तुम किसी अरबी से प्यार करती हो.


इयाद अपने परिवार के साथ 

मानव प्रजाति होने के नाते हमें यह सोचना होगा के हम कैसी नस्लों को पैदा कर रहे हैं जो अपने सर एक दूषित इतेहास का बोझ लिए हुए है. क्यूँ हम उन्हें भी अपने जैसा बना देना चाह रहे हैं ?

‘इदना’जो के अब यहूदी आर्मी का हिस्सा होने जा रही है,जिसके लिए इयाद ने स्कूल छोड़ दिया, पिता से भी नाता तोड़ दिया. इयाद और इदना, दोनों एक फ्लैट में हमबिस्तर होते हैं, इदना को इयाद से रिश्ता तोडना है और उसने आर्मी की भर्ती में होने वाली इंटरव्यू में किसी अरबी से शरीरक संबंधों के सवाल पर कहा था के वो किसी अरबी को नहीं जानती .
उस शेहेर में वेटर बने इयाद को अब फैसला लेना है के क्या वो यहूदी हो जाए या अरबी ही रहे

A Borrowed Identity OfficialTrailer (2015)

इरान रिक्लिस पिछले 30 सालों से इसरायली फलिस्तीनी संधर्ब में बेहतरीन फिल्मों का निर्माण कर रहे हैं . उनकी ‘lemon tree’ , ‘syrian bride’ ‘Zaytoun’ विश्व प्रसिद्ध फिल्में हैं जो आज भी प्रेरणास्रोत हैं .

A borrowed identity फिल्म इंसानी द्वंद्व की नायब तस्वीर है और बहुसंख्य जनगणना में अलप्संख्य लोगों के अंतर्द्वंद्व को बहुत ही सूक्ष्मता से पेश करती है .सरूपता और अस्तित्व की लड़ाई आज के दौर को पहले के समय से अलग करती है. हमारा बहुत सारा समय खुद को दूसरों के सामने साबित करने में चला जाता है,एक मानव की दुसरे मानव प्रति यह यात्ना कितनी सही है ?

– Gursimran Datla

cinema · film · greatest directors · gursimran datla

Cinema -ae-Bergman – वीरान पर लम्बी नींद

इंगमार बर्गमैन के आज 97वें जन्मदिन पर उस फनकार को कोटि कोटि सलाम, जिसने सिनेमा की कला को अपनी फिल्मों से कई सदियों के लिए जीवित कर दिया। उसकी फिल्मों का विश्व सिनेमा में इतना योगदान है के उसको फिल्मों को हटा लो तोह यह कला दो आयामी (two dimentional) लगने लगती है। 40 से भी ज़्यादा फ़िल्में बनाने वाले इस स्वीडिश फिल्मकार ने 3 ऑस्कर अपने नाम किये हैं और उनकी फिल्में मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों पर गहरी, दर्दनाक चोट करने वाली रहीं।

012-ingmar-bergman-theredlist (1)

उन्‍नीसवीं शताब्‍दी आधी बीतते-न-बीतते पूरी दुनिया में कला के स्‍तर पर बहुत सारे प्रयोग हुए । इसके पहले सिनेमा को एक गंभीर कला माध्‍यम के रूप में पहचान नहीं मिली थी। सिनेमा महज़ एक आश्चर्यचकित करने वाला माध्यम था। और यही वह दौर था, जब फ्राँस में ज्‍याँ लुक गोदार, इटली में फेलिनी, जापान में कुरोसावा, रूस में आंद्रेई तारकोवस्‍की, भारत में सत्‍यजीत रे और स्‍वीडन में इंगमार बर्गमैन एक नई सिनेमाई भाषा का सृजन कर रहे थे। इन लोगों ने सिनेमा को उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां सिनेमा और जीवन समान्तर लगने लगे। सिनेमा की भाषा इतनी जटिल और गंभीर भी हो सकती है, और पर्दे पर मनुष्‍य जीवन के बिम्बों को इस तरह रचा जा सकता है, ऐसा पहले कभी महसूस नहीं हुआ था।

बर्गमैन के पिता एक पादरी थे। घर में सख्‍ती थी, अनुशासन था, लेकिन बर्गमैन तोह आजाद थे। और धर्म-विरोधी भी होते गए। उनकी कई फिल्‍मों में एक तानाशाह पिता और सख्‍त परिवार के बिम्ब मिलते हैं, जो काफी हद तक उनके अपने जीवन के ही बिम्ब हैं। सिनेमा बहुत ही व्यक्तिगत कला है और इस माध्यम में गढ़ा झूठ फिल्म को महानता की और नहीं लेकर जा सकता। सिनेमा सच्चाई से बनता है और यह ज़िंदा भी सच्चाई के कारण ही रहता है।

“मेरी फ़िल्मों के लोग बिल्कुल मेरे जैसे ही होते हैं, सहजबुद्धि वाले, अपेक्षाकृत कम बौद्धिक क्षमता वाले लोग, जो अगर सोचते भी हैं तो तभी जब वे बात कर रहे होते हैं.”- इंगमार बर्गमैन

15 best films of Ingmar Bergman

बर्गमॅन के निधन के बाद उनकी उदासी भरी फिल्मों को देखना एक असाधारण अनुभव है। क्यूंकि जीवन सिर्फ हस्ते हुए गुजरने का नाम नहीं है, यह सवालों से भरा भी है , अंदाज़ों से भरा भी। बर्गमैन बहुत सारे जवाब दे देता है। उसकी फिल्मों के किरदार आप के आंतरिक मन से बातें करते हैं।

अपने जीवन में बर्गमैन ने 5 विवाह रचाये जिनसे 9 औलादें हुयी। उनकी फिल्मों में भी पति-पत्नी के रिश्तों की परतें नज़र आती हैं, हो सकता है के कोई बर्गमैन को समझ ना पायी हो। बर्गमैन के साथ ”लिव उल्लमन” का भी ज़िक्र बनता है जिसे उनके रिश्ते लम्बे समय तक रहे। बर्गमैन अपनी फिल्में खुद लिखते थे और सालों तक उनके बारे में सोचते रहते थे। बर्गमैन की फिल्मों का विषय भी मृत्यु दर, अकेलापन, और धार्मिक आस्था के आस पास रहा।

snapshot from his film
snapshot from his film

एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा के ” मेरी फिल्मों में सेक्स की अभिव्यक्ति मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण है, और विशेष रूप से यह सब से ऊपर है, मैं केवल बौद्धिक फिल्में ही नहीं बनाना चाहता। मैं दर्शकों को अपनी फिल्मों की भावना महसूस करवाना चाहता हूँ। मेरे लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण है इस के मुकाबले के वो फिल्म को समझे हैं के नहीं।

My last post on Bergman’s film ”The Passion Of Anna”

आखिर में मेरी तरफ से सिनेमा के इस महा कवि को मेरा नमन और यही कहूँगा के बर्गमान की फिल्में चेहरों के क्लोज अप के जरिये ही हमारे के अंतर की दुनिया की खबरें हमारे तक पहुँचातीं हैं। जब हम उनकी फिल्में देखकर निकलते हैं, तोह उनकी फिल्म के क्लोज अप वाले चेहरे हमारा लगातार पीछा करते रहते हैं…

A short must watch video on Bergan’s Dreams

– गुरसिमरन दातला