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Good morning, night – why can’t they rebel ?

1978 में इटली के इतेहास में वो समय आता है जब अल्डो मोरो ( प्रधानमन्त्री ) कुछ वामपंथी क्रांतिकारियों द्वारा बंदी बना लिया जाता है । लाल ब्रिगेड करके जाने जाती इस क्रांतिकारी फ़ौज ( जो के खुद को कम्युनिस्ट भी कहती है ) ने अल्डो मोरो के कई साथियों को मौत के घात उतार दिया। जब इस ब्रिगेड की जरूरतें नहीं मानी गयीं तोह उस प्रधानमन्त्री को भी मार दिया गया।
इसी ब्रिगेड की एक औरत मेंबर ‘चिअरा’ खुद को दो राहे पे खड़ा पाती है जहां वो क्रान्ति और आतंक के बीच का फर्क समझने की कोशिश करती है। Good morning, night इसी सवाल की कहानी है।

2003 में रिलीज़ हुयी इस इटालियन भाषा की फ़िल्म को निर्देशित किया है मार्को बेल्लूच्चिओ ने, जो इस से पहले “फिस्ट इन द पॉकेट” नाम की फ़िल्म से जाने जाते हैं।

 

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1978 तक इटली में लगातार 30 साल तक Christian-Democratic party (DC) का दबदबा रहा और Communist Party (PCI) को 1947 में ही सत्ता से बाहर कर दिया गया। उसके बाद हर साल 1970 तक PCI का वोट बैंक बढ़ता गया और यह इटली की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गयी। 70 तक लोग DC से परेशान होने लगे, उनके बदलाव की जरूरत महसूस होने लगी और वो PCI को विकल्प के तौर पर देखने लगे जो के कम्युनिस्ट विचारधारा रखती थी।

लेकिन ना ही तोह US और ना ही DC यह चाहती थी के PCI सत्ता में आये, उसकी विचारधारा के चलते।

अल्डो मोरो को बंदी बनाने के पीछे एक कारण यह भी रहा के वो DC और PCI के बीच एक पुल का काम कर रहे थे और लाल ब्रिगेड को यह ग्वार नहीं था। तोह मोरो के किडनैप होने पर सबसे ज्यादा ख़ुशी DC में ही मनाई गयी क्योंकि पूंजीवादी सरकार किसी भी हालात में साम्यवादी सरकार नहीं चाहती थी।
वो जहां मानवीय संवेदना और सामूहिक विचारधारा के प्रति वफादार होना चाहती थी वहीँ उसकी अपनी लाल ब्रिगेड, Working class के हाथ में सत्ता थमाने में विश्वास रखती थी। उनको क्रान्ति से ज्यादा विचारधारा से प्यार है।
सत्ताधारियों और दक्षिणपंथी लोगों पर अक्सर इतेहास से छेड़छाड़ करने के इल्जाम लगते रहे, क्या मार्क्सवादियों ने अपनी क्रान्ति के लिए कभी इतेहास को नहीं जोड़ा- तोड़ा ?

एक क्रांति क्या किसी एक सिद्धांत के साथ जुड़ाव रखने से हो सकती है ? क्या एक विचारधारा के प्रति वफादार होना क्रांति कहलायेगा ?
हर क्रान्ति अपने साथ बहुत सारा खून और लाशें ले कर आती है।यह हमने पिछले सदी में देखा। जीवित लोग मृत में तब्दील हो जाते हैं। ऐसे में क्रांतिकारी होने के लिए क्या चाहिये ?
क्रान्ति और आतंक में क्या फर्क है ?

क्या अब हम दुबारा किसी और क्रान्ति को झेल पाएंगे। हमने तोह कब्रें बनाने/लाशें जलाने की जगह तक नही छोड़ी। उसपर भी appartment खड़े कर लिए।

क्या सिर्फ नीचले तपने के/ या फिर मजदूर वर्ग को ही विद्रोह करने का अधिकार है ?
हम जिस पार्टी/विचारधारा के हैं क्या उसी से विद्रोह कर सकते हैं ?

हर कोई मरता है, पर सब का मरना एक सा नहीं होता। किसी की निर्णायक होती है तोह कोई बस, मर जाता है।

बचपन में हम सब बहुत धार्मिक होते हैं। धर्म एकता का पाठ पढ़ाता है, जैसे जैसे हम बड़े होते हैं हम देखते हैं के सबसे ज्यादा एकता का खंडन मज़हबी इलाके में ही होता है। तोह 25 तक आते आते मज़हब छूट जाता है। मरणो उपरान्त जन्नत/heaven का सिद्धांत भी सभी धर्मों में है। यह मानव मन में डर को बनाये रखता है।

आज एक मानव इसलिए जीवित है क्योंकि दुसरे मानव के मन में भय है। नहीं तोह कब से अपने साथ वालों को खत्म कर चुके होते।

Gursimran Datla

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