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Son of Saul – finding meaning in a meaningless place.

Son of Saul को इस साल हुए 88वें अकादमी अवार्ड समारोह में फॉरेन फ़िल्म कैटेगरी के तेहत बेहतरीन फ़िल्म के लिए अकादमी अवार्ड से सन्मानित किया गया।
विश्व सिनेमा में हंगरी के सिनेमा की अपनी एक विरासत रही है। 50 से 60वें दशक के दौर को हंगरी सिनेमा का सुनहरी दौर कहा जाता है, इसके मूल में बैठा हुआ समाजवाद, और विश्व युद्ध की परछाइयाँ, आज भी इसके सिनेमा में ज़िंदा हैं।
1981 में पहली बार एक हंगेरियन फ़िल्म को अकादमी अवार्ड से सन्मानित किया गया जिसका नाम था Mephisto। यह अब तक की सबसे चर्चित हंगेरियन फिल्मों में से एक है। उसके बाद बारी आई इस साल Son of Saul की। 50 से लेकर आज तक हंगरी में कई और विश्व व्यापी फिल्में बनी और इस मुल्क ने Bela Tarr और Mikos Jancso जैसे उम्दा फिल्मकार दिए।

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Son of Saul को निर्देशित किया है Laszlo Nemes ने। फ़िल्म दूसरे विश्व युद्ध के दौरान Auschwitz concentration camp में घटित होती कहानी पर आधारित है जहां साउल औसलंडर ( यहूदी कैदी ) अपने बच्चे को दफ़न करने के लिए एक रब्बी (दफनाने में मदद करने वाला) की तलाश करता है ।
पिछले साल कान्स समारोह में इस फ़िल्म ने ग्रैंड प्रिक्स खिताब जीता। इसके साथ ही गोल्डन ग्लोब जीतने वाली यह पहली हंगेरियन फ़िल्म बनी।
अक्टूबर 1944 में जर्मन नाज़ियों के कैम्पों में यहूदियों की लाशें जलाने का काम करते साउल के पास एक बच्चे का शरीर है, जो उसे खुद का बच्चा लगता है। गैस चैम्बर में रहने के बावजूद उस बच्चे की सांसें चलती हैं, और साउल उसका पोस्टमार्टम रुक्वाता है। तभी साउल उस बच्चे को यहूदी परम्परा से दफ़न करने के लिए रब्बी की खोज में लग जाता है।
नाज़ियों ने कई यहूदियों को लाशों को जलाने के लिए कैद कर रखा था जिनका काम होता है नग्न अवस्था में यहूदियों को जलाना। उनको गैस चैंबरों में झोंकना इत्यादि। इन कैदियों को sonderkommando कहा जाता था।
“The scrolls of Auschwitz” नाम की किताब ऐसे कई sonderkommandos का दस्तावेज़ है जिसके ऊपर इस फ़िल्म का ताना बाना बुना गया। फ़िल्म के निर्देशक nemes की यह पहली फ़िल्म है। इस से पहले वो Bela Tarr के सहायक निर्देशक रह चुके हैं।
35mm film पर इस फ़िल्म को 28 दिन तक फिल्माया गया। इस फ़िल्म की खूबसूरती, दस्तावेज़ी फ़िल्म की तरह की गयी फोटोग्राफी है जो कई लंबे सीनों से भरी है और हर फ्रेम आपको देहला जाता है और उस समय के घटनाक्रम को शैलो डेप्थ में प्रस्तुत करता है। Son of Saul शैलो फोकस और narrow field of vision का बहुत उम्दा काम है।
इस फ़िल्म को देखते हुए रुसी फिल्मकार एलेन क्लिमोव की बेहतरीन रचना “come and see” की याद ताज़ा हो जाती है जो के इतनी ही भयावह और डरावनी है।

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Son of Saul शुरू ही उन visuals से होती है जो नए फिल्मकार के लिए फिल्माने मुश्किल हैं। पूरी फ़िल्म में कैमरा साउल का पीछा करता रहता है और साउल के चेहरे में ऐसे कैम्पों की त्रासदी और इंसानी भावना को रेखांकित करता है।
राष्ट्र, सभ्यता और संस्कृतियों पर गर्व करने वाले लोगों को यह फ़िल्म ज़रूर देखनी चाहिये। नग्न अवस्था में जल रही लाशों, गैस चैंबरों में झोंके गए बच्चे बूढ़े और नंगी करके नदी में डाली गयी औरतें किस मज़हब मुल्क या कौम की रही होंगी ? क्या वो मानव भी रही होंगी ? सिनेमा आज के नाज़ियों के लिए खतरनाक है क्योंकि यह असलियत के सबसे करीब ले जाता है इसलिए उन ठेकेदारों की कोशिश है के सिनेमा को एंटरटेनमेंट, मज़ाक,डांस और वाहयात कॉमेडी से भर दो ता के लोग यह ना देख पाएं के के कहाँ कितने दफ़न हुए।
वक़्त बे-वक़्त सिनेमा के परदे पर होलोकॉस्ट को लेकर अलग अलग पेशकारियां बेहेस का मुद्दा बनती रहीं है और फ्रांस के न्यू वेव सिनेमा के पितामाह ‘गोडार्ड’ ने यह तक कह दिया था के “Cinema’s great failure was its failure to show the Holocaust”.
फ़िल्म के अंत में नायक के चेहरे का क्लोज अप मिरिचिका जैसा व्यतीत होता है और कई सालों की त्रासदी को एक छण में व्यक्त कर देता है।
फ़िल्म देखने के बाद किसी भी तरह की भावना नहीं जागती और यही इस फ़िल्म की खूबी बन जाती है, एक ऐसी जगह जहां मानवीय भावना खत्म हो गयी हो और सिर्फ लाशों के ढेर हों और अजीब सी गंध,गुस्सा और ना-उम्मीदी।
रोने का समय नहीं है और परमात्मा खुद तुम्हें गैस के चैंबरों में झोक रहा है।
Gursimran Datla

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