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“मसान” – मोहोब्बत से पहले और बाद का डर

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सबसे पहले वही लाइन जिसके लिए आज कल फ़िल्म के बारे में लिखा-सुना जाता है।
क्या यह फ़िल्म देखनी चाहिये ?
यह फ़िल्म अवश्य देखनी चाहिये।

मसान इस दौर की उम्दा फिल्मों में से एक है। यह साल गंभीर सिनेमा के लिए बढ़िया रहा है। कोर्ट, किल्ला, तितली और मसान जैसी फिल्में बनाने वालों में आ रही सतर्कता और इस विषय के प्रति समर्पण का ही नतीजा है कि ना ही यह फिल्में सिनेमा हॉल तक पहुंच रही हैं,  बल्कि इन्हें फ़िल्म देखने वालों का भरपूर समर्थन भी मिल रहा है। समंदर दूर ही सही पर एक झलक ही मिले तोह तसल्ली होती है। “मसान” वो झलक है।

“मसान” नीरज घ्यावान की पहली निर्देशित फीचर फ़िल्म है। नीरज इस से पहले “शॉर्ट्स” फ़िल्म में एक कहानी निदेशित कर चुके हैं, गैंग्स ऑफ़ वस्सेयपुर में अनुराग के असिस्टेंट रह चुके हैं। इंजिनीअर और एम बी ऐ की पढ़ाई कर चुके नीरज “मसान” से हिंदी सिनेमा में वाराणसी की पृष्ठभूमि पर अनोखी फ़िल्म “मसान” लेकर आये हैं।
“मसान” जैसा पहले कभी परदे पर कुछ उतरा नहीं। मसान कुछ हद तक ईमानदार, कसी हुयी कहानी है। फ़िल्म का क्राफ्ट, फोटोग्राफी और गीत बहुत बढ़िया हैं। अविनाश अरुण का कैमेरा बहुत कुछ दिखाना चाह रहा है और अंततः वो कम फ्रेम में ही बहुत कुछ बोलता है। कहानी जो दिखती है असल में उस से कहीं गहरी है। सिनेमा की इस ताकत का बाखूबी इस्तेमाल किया है फ़िल्म में। ख़ास करके ऋचा चड्डा के किरदार के लिए।
वरुण ग्रोवर ने बहुत ही बढ़िया तोह नही, पर हाँ, चुस्त स्क्रीनप्ले लिखा है। अगर पुलिस वाले और संजय मिश्र का किरदार छोड़ दें तोह फ़िल्म में बाकी सब नयापन है।
फ़िल्म का कैमरा आपको भारत का दिल कहे जाने वाले वाराणसी की तस्वीरें ऐसे दिखाता है जैसे छोटे छोटे बच्चे क्लिडियोस्कोप पर एक आँख लगाये बैठे हों। गंगा किनारे जल रहे शरीर, संगम में 30 रुपये की बोट यात्रा, सब अच्छा है।
ऋचा चड्डा ने उम्दा अभिनय किया है मानो यह किरदार लिखा ही उनके लिए गया हो। संजय मिश्रा जी जो भी करें वो दिल को भाते हैं। एक बेबस पिता के किरदार को उन्होंने जीवित कर दिया है। “दम लगा के हईशा” के बाद उन्हें गंभीर किरदार में देखना बढ़िया रहा।
फ़िल्म से डेब्यू कर रहे विक्की कौशल ने दीपक के किरदार में इस बेल्ट के युवाओं के सपनों,उम्मीदों और इश्कों को बाखूबी प्रस्तुत किया है। श्वेता त्रिपाठी अपनी इस पहली फ़िल्म से जिज्ञासा जगतीं हैं पर उनके किरदार को सही से गढ़ा नही गया। मानो बहुत ही जल्दबाज़ी से उनसे अभिनय करवाया गया हो।
पंकज त्रिपाठी जैसे अभिनेता को फ़िल्म में waste किया गया है।
फ़िल्म में बहुत सारी खामियां थी जिसमें इसके प्लाट का पूर्वकथनिक ( predictable ) होना शामिल है। फ़िल्म का अंत फ़िल्म के साथ नही जाता और यह फ़िल्म जो अंतर् मन का काव्य हो सकती थी, इसे फ़िल्मी ड्रामा बना देता है। फ़िल्म के अहम किरदार “झोंटा” के किदार को पूरी इज़्ज़त नही मिली और ना ही उसके किरदार के साथ न्याय हुआ। फ़िल्म के भावनात्मक दृश्यों में अगर पार्श्व संगीत देकर ड्रामा ना क्रिएट किया जाता तोह ज्यादा फ़िल्म के हक़ में होता। दृश्यों में चुप्पी फ़िल्म को बहुत आगे पहुंचा सकती थी।अब पता नही कान्स फ़िल्म समारोह में भी यही कट दिखाया था या भारतिय दर्शकों के किये फ़िल्म में पार्श्व संगीत को बाद में जोड़ा गया। यह तोह नीरज ही जानते होंगे।
हाल ही में हुए कान्स समारोह में फ़िल्म को पुरुस्कारित की गया है पर इस फ़िल्म को देखने की और बहुत सारी वजहें हैं।

खैर, इस सब के बावजूद, कम लंबी होने के कारण फ़िल्म अपने विषय वास्तु पर बनी रहती है आत्मिक शान्ति के लिए जाने जाते शेहेर की 5 आत्माओं को आत्मिक शान्ति की खोज करते, यह फ़िल्म,अच्छे से प्रस्तुत करती है।

फ़िल्म महान तोह नही है पर बजरंगी भाईजान, बाहुबली और हैप्पी न्यू इयर देखने वाले दर्शकों को जरूर देखनी चाहिये।
हो सकता है इस फ़िल्म से वो सिनेमा हॉल जाने पीछे असली मकसद ढून्ढ पाएं। अच्छे निर्देशक तोह मिल रहे हैं पर क्या उतनी ही समझ रखते फ़िल्म व्यूअर भी मिल रहे हैं ?
“मसान” जैसी फिल्में अगर हर दरवाज़े नहीं पहुंचेंगी तोह समूहक समझ, जिसकी हिन्दुस्तान में भारी कमी है और सिनेमा इस कमी को दूर करने में सबसे शसक्त माध्यम है, उसका सपना पूरा नहीं हो सकता।

“मसान” जीवन का संगीत है। हो सकता यह दुष्यंत कुमार की कविता से आपको प्रेम करवादे और आप भी पुल सा थरथराने लगें। फ़िल्म की एक लाइन जो पूरी फ़िल्म का निचोड़ है और आपके अंदर तक घर कर जाती है –
शालू दीपक से कहती है – “आप ईमानदार हैं, बिलकुल निदा फ़ाज़ली की ग़ज़ल की तरह”।

– Gursimran Datla

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