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A Long take of revolution

जो आवाज़, अपनी कला के माध्यम से दूसरों को सुकून देती है वो जब आहात होती है तोह उसकी आह पूरे समाज, पूरी संस्कृति को लगती है। हमारी सभ्यता की सबसे बड़ी खामी यही रही है के हम दुआ के रूप में मिली किसी कला के प्रति न आभार जता पाये ना ही अपनी गलती के हुए नुक्सान पर कभी शर्मसार हुए। यह बेशर्मी इंसानी फितरत नहीं। जिसे हम परमात्मा मानते हैं, उस कोमल वक्तित्व वाली चीज़ से भी हम या तोह ताकत मांगते है या पैसा मांगते हैं। पैसे इसलिए क्यूंकि उस से ताकत खरीद सकते हैं। यह ताकत इंसान में गुरूर और ज़िद का परिणाम है, शायद इसी गुरूर और ज़िद जैसी ना मुराद आदतों से पार पाने के लिए कला या कहें किसी अलग चीज़ को रचने, खोजने का सिलसिला शुरू हुआ।

लेकिन जिस वक़्त कहीं कोई अपने किसी कोने में बैठा कुछ गढ़ रहा था, या कहें के किसी रचना को अंजाम दे रहा था, वहीँ पर किसी और कोने में उसे दबाने, रोकने और ना होने देने की राजनीती भी शुरू हो गयी थी। यह तब से बद-स्तर चलती आ रही है। सत्ता चाहे फिर सफ़ेद कपड़ों की हो या खाकी कपड़ों की, सबको इतना डर चुनाव की हार से नहीं लगता जितना अभिव्यक्ति के विभिन्न विभिन्न माध्यमों से। अगर और सटीक कहूँ तोह सिनेमा से।

क्यूंकि सिनेमा की पहुँच हवा की तरह है। यह हवा का रुख मोड़ा तोह जा सकता है पर इसको टाला नहीं जा सकता। 2003 में आई जेम्स मिलर की फलीस्तीनी फिल्म ”डेथ इन गाज़ा” के बनने के दौरान ही एक इस्राइली सिपाही ने जेम्स को गोली मार दी। फिल्म प्रेमिओं द्वारा उस फिल्म के लिए जेम्स को सिनेमा का शहीद घोषित किया गया और इस फिल्म ने दुनिया को गाज़ा में चल रही हिंसा का हाल बताया।

सिनेमा में ऐसी हज़ारों दास्तानें मिलेंगी जहां इस माध्यम के लिए इस बनाने वाले और देखने वालों ने हर कीमत पर इसकी अभिव्यक्ति को बचाने की हरसंभव कोशिश की हो। फिर चाहे वो अंतर्राष्ट्रीय केरल फिल्म समारोह के दौरान ह्यूमन चेन बनाना हो या पिछले वर्ष FTII में ABVP द्वारा शात्रों की पिटाई हो। यह सिनेमा के प्रति प्रेम ही था के लात घूसों की रफ़्तार, 24 फ्रेम प्रति सेकंड की रफ़्तार के सामने  कमजोर, बुजदिली भरी निकली , इसलिए सिनेमा वालों ने सेह भी ली।

यह भी याद रखने लायक है के ईरान के विश्व पसिद्ध फिल्मकार जफ़र पनाही को 20 सालों के लिए अपने ही घर में नज़रबंद किया गया है। इसके बावजूद यह सिनेमा जैसे माध्यम की शक्ति है के इस अवस्था में बैठा फिल्मकार भी अपनी फिल्म को एक पेन ड्राइव में डाल कर केक में छुपा कांन्स में पहुंचाता है। जफ़र एक वार्ता में कहता है के एक फिल्मकार के तौर पर मेरा सारा कार्यकाल सीमाओं, प्रतिबंधों और मजबूरियों के आसपास रहा है। पर यह इस रोक के बावजूद जफ़र पनाही 10 से भी ज्यादा विश्व प्रसिद्ध फिल्में बना गए।

सिनेमा की महानता यह रही है के यह उस बहाव के हमेशा उल्ट चला है जिस बहाव को लोग अपनी मान्यता बना लेते हैं या धर्म संस्कृति का नाम देकर सदियों तक उस किनारे रुके रहते हैं। सिनेमा गति का प्रतीक है और यही दलील काफी है के इसे एक मानसिकता और स्थिर विचारधारा वाला व्यक्ति नहीं संभाल सकता। निरंतर बदलाव, समय समय पर सिद्धांतों का आंकलन, समीक्षा यह सिनेमा के जरूरी अंग हैं।

FTII में जो रोस और तब्दीली की भावना पिछले कुछ दिनों से चल रही है, यह असल में उन राजनितिक स्थिर ताकतों के खिलाफ प्रतिरोध है जो कला के विद्यार्थियों पर एक स्थिर विचारधारा लादना चाहती हैं। यह गति को रोकने के बराबर है और गति रुकनी नहीं चाहिये। यह तारकोवस्की का वो लॉन्ग टेक है जिसमें कट नहीं आ सकता। क्यूंकि यह क्रान्ति सिर्फ FTII की क्रान्ति, या किसी संस्थान की क्रान्ति नहीं है है ,ना ही यह किसी विचारधारा के खिलाफ क्रान्ति है, यह क्रान्ति एक पूरी पीढ़ी की क्रान्ति है। क्रान्ति वाला यह लंबा टेक तय करेगा के हमारे हाथ में क्या सिर्फ RTI फॉर्म का झुनझुना रहेगा या फिर कैमरा रोल करके ‘एक्शन’ बोलने की आज़ादी भी होगी ?

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यह क्रान्ति तय करेगी के मेरे, तुम्हारे जैसे इंडिपेंडेंट फिल्मकार क्या NFDC ,Children Film Society का ही मूह ताकते रहेंगे या अपने सिनेमा पर अपनी मल्कियत का हक़ रखेंगे। यह आवाज़ तय करेगी के उड़ीसा, झारखण्ड, पंजाब का किसान उसी गर्व के साथ कैमरा भी उठा सकता है जिस गर्व के साथ वो कुदाल उठाता है? यह क्रान्ति उसी गति के साथ जारी रहे आज भी, कल भी, हमेशा। क्यूंकि यह क्रान्ति पहले हमारी खुद की मान्यताओं के साथ है और फिर बाहरी स्थिर लोगों के साथ। अगर हम सिनेमा के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा सकते हैं तोह हम इसके लिए अपना सबकुछ गवा भी सकते हैं।

एक लाजवाब हवाले से अपनी बात खत्म करूँगा –

“Never stop. Never stop fighting. Never stop dreaming. And don’t be afraid of wearing your heart on your sleeve – in declaring the films that you love, the films that you want to make, the life that you’ve had, and the lives you can help reflect in cinema. For myself, for a long time… maybe I felt inauthentic or something, I felt like my voice wasn’t worth hearing, and I think everyone’s voice is worth hearing. So if you’ve got something to say, say it from the rooftops.” – Tom Hiddleston

– गुरसिमरन दातला

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3 thoughts on “A Long take of revolution

  1. Who cares FTII ? I am living in Pune since last 20 + years. FTII is only institute which comes in news because of Agitations, Strikes , Non working for all wrong reasons etc. Whats problem with u people? Cannot you do study like Achha Bacche? Why wasting National Resources?

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    1. FTII is the only prestigious film institute of India. A country having a temple as well a cigarette/wine shop on every corner of it, having only one film institute for 121 crore people. now for you what is national resource ? Is is the temples, bhawans or art institutes like FTII , NSD ?
      secondly, on your remark of in news because of Strikes. Tell me my friend when did art needs to use loud voices ?
      when its freedom of expression is threatened, blocked or overpowered by political propaganda. If they will not speak for them then who will ? supporting and demanding freedom for art do you think its as a wrong reason ?

      और अगर आप मूक़धारी बन कर चुप चाप जो हो रहा हो उसे सेहन करने वालों को अच्छा बच्चा मानते हैं तोह हमें गर्व है के हम अच्छे बच्चे नहीं .

      Thank you.

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