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The Idlers of the Fertile Valley – एक यह भी ग्रीक त्रासदी

The Idlers of the Fertile Valley ग्रीक भाषा में बनी सबसे बेहतरीन फिल्मों में से है। इस फिल्म में सिनेमा का क्राफ्ट भरपूर है और यह पेस के मामले में कहीं कहीं रूसी फिल्मकार अंद्रेई तारकोवस्की की याद दिलाती है। Nikos Panayotopoulos ग्रीक सिनेमा के महारथी हैं और थेओ अंगलेओपोलौस के बाद वो दुसरे सबसे प्रसिद्ध ग्रीक फिल्मकार हुए हैं।

न्यू वेव ग्रीक सिनेमा अपनी सुर्रियल, डार्क और पारिवारिक गड़बड़ियों के ऊपर आधारित रही है। फिर चाहे वो Athina Rachel Tsangari की ‘attenburg’ हो या Yorgos Lanthimos की ‘Dogtooth’. ग्रीक सिनेमा का इतिहास पुराना रहा है। लेकिन ग्रीक फिल्मों का निर्माण 1970 के मध्य में तानाशाही के पतन के बाद और ज्यादा बढ़ा। नए फिल्मकारों की आमद हुयी। जिन्होंने ब्लैक कॉमेडी के साथ बहुत प्रोयोग किया।

निकोस की फिल्म The Idlers of the Fertile Valley भी उसी डार्क ब्लैक कॉमेडी के अंतर्गत आती है, पर इस फिल्म की फोटग्राफी इतनी सशक्त और कमाल है के बहुत कम शब्दों के साथ आप, किरदारों के हालात और हुलिये को समझने लगते हैं। फिल्म किसी कविता की तरह गढ़ी गयी है जो दूर से देखने पर एक त्रासदी जापती है पर अगर परतों को छिला जाए तोह एक कॉमेडी हो उठती है।

The-Idlers-of-the-Fertile-Valley-1978

एक पिता अपने 3 हट्टे कट्टे पुत्रों के साथ एक शहर की कंट्रीसाइड में एक बंगले में रहने जाता है। साथ में उनके, एक खूबसूरत योवन से भरी नौकरानी है जो उन चारों का ध्यान रखने के लिए उनके साथ वहाँ रहती है। चारों मर्द सिर्फ वहाँ पर रहते, खाते, घुमते हैं। घर से बाहर जाने की मनाही है। सो दो पुत्र और पिता तो ज्यादातर समय अपने अपने कमरों में सो कर निकालते हैं पर तीसरा बेटा, इस बोरियत में नहीं रहना चाहता। वो घर छोड़ने की स्कीम घडता है। लेकिन बाकी किसी को यह गवारा नहीं। सारी कहानी इसी इर्द गिर्द फैली है। इस में अब पिता को ट्यूमर भी हुआ है , नौकरानी का सबके साथ चक्कर भी चल रहा है। एक भाई 7 साल से सिर्फ सो ही रहा है।

इतने सब के बावजूद फिल्म अपनी धीमी पेस नहीं छोड़ती। फिल्म का शुरूआती एक घंटा तोह यह स्पीड और भी स्लो है। कैमरामैन बड़े इत्मीनान से घर के आस पास का माहोल बुनता है इसलिए के देखने वाला भी उंघाई और उनींदरा को महसूस कर सके।

फिल्म की कला और सेट कमाल के हैं , यह कहानी को और भी गंभीर बनाते हैं। गहरे हरे रंग की दीवारें, मैले कुचैले परदे, घुटन भरी लॉबी वगैरा जिन्हे देख कर ही अवसाद निराशा और शक्तिहीनता महसूस होने लगती है, ऐसे में समझा जा सकता है के किरदार किस मनोस्थिति में वहाँ रहते होंगे।

फिल्म के किरदारों का काम कमाल है , हालांकि पूरी फिल्म एक असारता और खालीपन के स्वभाव से गढ़ी गयी है। फिल्म बहुत सारे लोगों को बोर लगी होगी या अगर आप देखेंगे तोह आपको भी बोर लग सकती है पर यही इस फिल्म का व्यंग्य भी है के हम कब तक गतिहीन और अचल ज़िंदगी जीते रहेंगे।

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– Gursimran Datla

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