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Bombay velvet – Indian magical realism.

गाब्रिएल गार्सिया मार्केज से जब पूछा गया
था कि अगर किसी लेखक को सफलता या प्रसिद्धि जल्द मिल जाती है, तो यह उसके लेखन के लिए अच्छा है या बुरा?
इस पर मार्केज ने कहा था कि लेखक के लिए
प्रसिद्धि किसी भी वय में बुरी होती है. मैं तो चाहता हूं कि मेरी किताबें मेरी मृत्यु के बाद प्रसिद्ध हों, खासकर उन देशों में, जहां किताबें भी माल की तरह से खरीदी-बेची
जाती हैं। उनके उपन्यास-लव इन द टाइम ऑफ कॉलरा पर बनी फिल्म ने सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले थे। इसी महीने हिन्दुस्तानी सिनेमा घरों में रिलीज़ हुयी अनुराग कश्यप की Bombay velvet खम्बाटा, जोहनी और रोज़ी का लहू है। लाल सियाह लहू। मैजिक रिअलइस्म वाला लहू।

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बॉम्बे वैलवेट सिर्फ बॉम्बे वेलवेट है। यह अनुराग कश्यप की पांच नहीं है, गुलाल नहीं है, वस्सेयपुर नहीं है। यह सिर्फ बॉम्बे वेलवेट है। इस फ़िल्म की संपादक (editor) चाहे अमरीकी ब्रांड की हो, पर बॉम्बे वेलवेट सिर्फ बॉम्बे वेलवेट है। ये ना तोह टैक्सी ड्राईवर है, ना गॉडफादर, न रेजिंग बुल।
जादुई यथार्थवाद ( magic realism ) सौंदर्य या फिक्शन की एक शैली है जिस में असली दुनिया के साथ जादुई तत्वों का मिश्रण होता है। हालांकि यह सबसे अधिक एक साहित्यिक शैली के रूप में प्रयोग किया जाता है, जादुई यथार्थवाद फिल्म और दृश्य कला के लिए भी लागू होता है।

इस फ़िल्म के साथ वही हुआ जो एक जादूगर के जादू का राज़ खुलने पर होता है। लोग उस में मज़ा लेने के बजाए उस के पीछे का राज़ समझना शुरू कर देते हैं। बॉम्बे वेलवेट के साथ भी कुछ कुछ यही हुआ। यह पता होना के ट्रांस, बॉम्बे वेलवेट कैफ़े का सेट बॉम्बे नहीं श्री लंका में लगा था, इस से देखने वाले बॉम्बे ना पहुँच कर अनुराग की महानता को निहारने लगे। जब फ़िल्म से ज्यादा उस निर्देशक के ज्यादा चर्चे हों, तोह यह सोचने वाली बात है।
फिर भी अनुराग मैजिक रियलइस्म क्रिएट करने में सफल रहे। फ़िल्म का संगीत, कला, सेट, कॉस्ट्यूम कमाल के थे। ख़ास तारीफ लाइट की करूँगा। फ़िल्म में भरपूर अच्छे तरीके से जिसका इस्तेमाल हुआ।

फ़िल्म को समझने के लिए 1950-1960 के बॉम्बे को समझना होगा। 1950 के दशक के अमरीकी सिनेमा को भी समझना होगा। उस बम्बई को समझना होगा जो तब से टूटनी शुरू हुयी अब तक टूटते ही जा रही है।
फ़िल्म की एडिटिंग देख कर लगता है के थेलमा शूमाकर का काफी दखल है क्योंकि फ़िल्म के कट और सीने को जोड़ने का अंदाज़ 50 के दशक की अमरीकी सिनेमा की याद दिलाता है।

एमिली और मिडनाइट इन पेरिस जैसी फिल्में भी मैजिकल रियलइस्म के संधर्भ की फिल्में हैं। हिन्दुस्तानी सिनेमा की सबसे बड़ी विफलता यही रही के यह अपने सिनेमा देखने वालों के मन में संवेदनशीलता नहीं भर सका। जिसका खामयाज़ा बॉम्बे वेलवेट जैसी फिल्मों को भुगतना पड़ा।

रनबीर का अब तक का सर्वोत्म् प्रयास। उन्होंने मेहनत की लगती है। लेकिन अनुराग की पिछली रिलीज़ “अगली” से बॉम्बे वेलवेट बहुत अलग है। बॉम्बे वेलवेट
‘अगली’ जितनी इंटेलीजेंट क्राफ्ट नहीं।बॉम्बे वेलवेट को कमर्शियल रखा गया। करन जोहर के कई दृश्य धक्के से डाले लगे।
संगीत बढ़िया पर ड्रामा हावी रहा। अनुष्का के किरदार में कुछ नया नहीं। फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी फ़िल्म के कंटेंट के साथ ज्यादा न्याय नहीं कर सकी।  फ़िल्म की पटकथा काफी कमजोर थी। गीत के बोल कमाल और सीन के अनुकूल। कला निर्देशन सर्वोत्तम। इस फ़िल्म को देखना इस लिए भी जरूरी है कल अगर 5 साल बाद कोई ऐसी फ़िल्म आये तोह कम से कम पढ़े लिखे लोग उसके साथ न्याय कर सकें। बेवकूफों की जमात बना कर हमने इंजीनेअर तोह बहुत पैदा किये। कुछ फ़िल्म प्रेमी भी कर दिए होते तोह अच्छा होता।
– Gursimran Datla

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