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भूचाल – एक एहसास

दिल्ली के लोगों को आज कुछ पल के लिए जीवन की सूक्षमता का एहसास हुआ होगा। नॉएडा, गुड़गांव साउथ दिल्ली जैसे इलाकों में बहु-मंज़िला इमारतों में काम करते सूटेड-बूटेड लोग जो पूरे हिंदुस्तान को चलाने का अहम और गरूर रखते थे, आज उन्हें अपने सामने हिलता हुआ कंप्यूटर, अपनी डोलती हुयी कुर्सी देखकर कैसा महसूस हुआ होगा ? 6.5 या 7.9 की “जी डी पी” पर बहस करते माथा फोड़ते कॉरपोर्टेस और इंटेलेक्चुअल जमात क्या जानती है के अगर भूचाल की तीव्रता 7.5 से 7.9 हो जाती तोह क्या होता ? फिर “जी डी पी” का रखवाला कौन होता ? कुछ क्षण का ही सही पर इस भूचाल से जो यह सो कॉल्ड या कहिये सो कोल्ड पढ़ी लिखी इलीट जमात है, इन्होंने जीवन और मृत्यु के केंद्रबिंदु को शायद ही कभी इतने नज़दीक देखा होगा। सीढ़ियों से नीचे उतरते क़दमों ने एक बार तोह मन में जीवन का लेखा जोखा जरूर किया होगा।
सवाल ये है के यह एहसास इनमें कोई बदलाव लाएगा ?

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पिछले 2 दिन अगर आपने न्यूज़ चैनल देखे होंगे तोह पत्रकारों के मुह से दिल्ली के नेता संवेदनहीन, दिल्ली की पुलिस संवेदनहीन, दिल्ली की जनता संवेदनहीन जैसे वाक्य आम सुने होंगे।ऐसा लग रहा था मानों दिल्ली भूल गयी हो के वो साँस पर चलती है।  तोह क्या माना जाए के इस भूचाल के एहसास से वो संवेदनशीलता वापिस आ सकती है ? कहावत है के जो जीवन में मृत्यु को एक बार नज़दीक से देख ले वो फिर बचे हुए जीवन के हर एक पल को भरपूर जीता है। तोहफे की तरह। नेपाल जो इस भूचाल के गढ़ रहा, कैसे वो हिन्दुस्तान का बॉर्डर पार कर के बिहार से होते हुए दिल्ली आ पहुँचा। क्यों ये कुदरती आपदाएं अन्तर्राष्टीय बॉर्डर नही समझतीं ?  क्यों कोई वेदांता या पारस या अडानी इन आपदायों को रोकने के लिए डैम नहीं बनाता ? यह भी सोचता हूँ के जिस दिन अडानी, मोदी, अम्बानी मरेंगे तोह उनकी अस्थियां उनके ही डैमों में विसर्जित की जाएंगी ? क्योंकि संस्कृति और सभ्यता से निकली हर नदी तब तक किसी ना किसी हैडल पॉवर प्रोजेक्ट की चपेट में आ चुकी होगी। मृत्यु केवल उतना ही समय लेती है जितना भूचाल की तीव्रता 7.5 से 7.9 जाने में। ऐसे में एहम,अमीरी और हिंसा भरा जीवन जीना बेवकूफी से बढ़ कर कुछ नहीं। सब वसीयतें यहीं रह जातीं हैं। सब कारोबार भी। सब प्रोजेक्ट भी। बहुत सारे मित्र दिल्ली में हैं उम्मीद करता हूँ के वो सुरक्षित होंगे और अपने आगे पड़े हिलते हुए कंप्यूटर को देख कर ये एहसास जरूर करेंगे के वो वाक़्य ई जी रहे हैं या किसी 7.9 तीव्रता वाले भूचाल का इंतज़ार कर रहे हैं।
– Gursimran Datla

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