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Miss Violence

वैसे इस फ़िल्म के ऊपर लिखने का कोई मकसद नहीं था पर कल एक खबर के चलते आज ज़िक्र कर रहा हूँ। हाल ही में ‘delhi Belly’ की फ़िल्म में काम करने वाली अभिनेत्री पूर्णा जगन्नाथन ने अपने साथ बचपन से हो रहे यौन उत्पीड़न का खुलासा किया है। यह खबर ज्यादा चर्चा में नहीं है क्योंकि ये दीपिका पादुकोण या सोनम कपूर  के साथ नहीं हुआ इसलिए। ख़ैर, पूर्णा कहती हैं के 9 साल की उम्र में वो इस हिंसा का शिकार हुयी और एक पडोसी द्वारा उसके साथ जब ये जलालत की गयी तोह शराबी बाप के और परिवार के बाकी सदस्यों द्वारा मना करने के चलते कभी वो कभी कुछ नही बोल पायीं। परिवार में एक नियम था के कोई ये बात बाहर नही करेगा। ऐसे में परिवार भी उसी घेरे में आ जाता है जहां बाकी सामाजिक ग्रुप आते हैं। ऐसी ही घटना से  मिलती जुलती है ग्रीक फ़िल्म ‘Miss Violence’.

2013 में आई ग्रीक भाषा की फ़िल्म “Miss Violence” इस कहावत का अपवाद है के इंसान परिवार में या कहिये के अपने ही घर में सबसे सुरक्षित होता है। Alexander Avranas द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म सत्तरवें वेनिस फ़िल्म समारोह ग्ज़और टोरंटो जैसे अंतर्राष्ट्रीय समारोह में सिल्वर लायन और वोल्पि कप जैसे प्रसिद्ध इनाम जीत चुकी है। फ़िल्म की कहानी 11 साल की अंजलिकी की मौत से शुरू होती है, जो अपने 11वें जन्मदिन पर आत्महत्या कर लेती है। फ़िल्म उन परतों को खोलती है, जिस से सारा परिवार इस आत्महत्या को एक्सीडेंट का रूप देना चाहता है। miss violence ग्रीक पीड़ा और परिवारों के अंदर छिपी बैठी बुराई के तांडव की कहानी है जहां बंद दरवाजों के पीछे चलते हुक्म, मासूम जुबानों पर लगाम लगा देते हैं।
अब वो समय है जब हमें इज़्ज़त मान से उपर उठ कर अपने आदर्शों और नियमों की किताबों को दोबारा फ्रोलना होगा के कहीं हम परिवारिक बंदिशों के चलते अपने वजूद तोह नही खो रहे। हिन्दुस्तानी परिवारों को अब अपने बच्चों को नियमों और असूलों की बेड़ियों से आज़ाद करना होगा ता के वो अपने भले बुरे की सोच समझ खुद पैदा कर सकें।

उज्वल भारत में भी अपार्टमेंट नुमा इमारतें खड़ी की जा रही हैं और इमारत को जीवन का सपना बोल 40 लाख से लेकर 10 करोड़ तक बेच जा रहा है। miss violence भी किसी समय महान रहे ग्रीस के athens में खडी एक अपार्टमेंट बिल्डिंग के बंद बरवाज़ों के पीछे की वास्तविकता और दुरपयोग होते मनुखी भावनाओं का चित्रण है। खुले मैदानों से 3BHK की छत का स्वपन मज़ेदार नही हो सकता।
ग्रीक न्यू वेव सिनेमा ने कुछ जबरदस्त डार्क थ्रिलर दिए हैं जिसमें रेचल संगारी की ‘अटेंबेर्ग’ , यारगो लान्थिमो की ‘डॉगटूथ’ और अलेक्सेन्डर की miss violence प्रमुख फिल्में हैं।
Miss Violence हिंसा से उपजे इनकार की कहानी है और उस हिम्मत की गाथा है जो परिवार में चलते उत्पीड़नों से फैली है। हिन्दुस्तान में भी ऐसी कई कहानियाँ रोज़ घटती हैं पर हमारे कायदों और सभ्यता दी दीवार इतनी ऊँची है के उसे अभी तक फांदा नहीं गया।

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इस फ़िल्म के शुरुआत में पैदा हुयी रेहस्य की भावना चलती फ़िल्म के साथ साथ भ्यावेह डर में बदलने लगती है। अलसेंडर 1993 में आई माइकल हनेकी की फ़िल्म “the seventh continent” से कहीं न कहीं प्रभावित लगते हैं। कुल मिला के अगर सिनेमा समाज को मनोरंजन (फूहड़ता ) दे रहा है तोह उसे समाज के बन्दे दरवाजों के पीछे भी झांकना चाहिये।

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