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श्रद्धा या अंधापन

अंधापन दो तरीके का होता है। एक जो शारीरक होता है और एक जो समय की लोर में किसी इंसान में भगवान् को देख लेने पर हो जाता है। पहली तरह के अंधेपन का इलाज शायद मुमकिन भी हो पर दूसरी तरह के अंधेपन का इलाज मुमकिन नहीं। यह भी ध्यान में रखा जाए के हर धर्म का जन्म, अन्धकार को मिटाने के लिए हुआ था लेकिन इसके विपरीत आज धर्म ही अंधी श्रद्धा का प्रतीक बन गया है। मूर्ति पूजा हर दौर में प्रचलित रही है और उन मूर्तियों पर बहाई जाती अंधाधुन्द श्रद्धा और पैसा किसी का भी मन ललचा सकती है। हम क्योंकि दिल से सोचते हैं और, जो हमारी बात करे हम उसके साथ हो लेते हैं।
आज के युग में यह हुआ है के टेक्नोलॉजी और साइंस की मौजूदगी के बावजूद भी कुछ भगवान् हमने अपनी कम्फर्ट और मतलब के हिसाब से बना लिए हैं। मसलन फरारी लेने का इछुक सचिन तेंदुलकर को पूजता है, लंगोट पहन पड़ोसन को फ़साने वाला सलमान खान को पूजता है और सुप्रीम कोर्ट से बचते हुए गुंडागर्दी फैलाने वाला नेता को पूजता है। आप के चापलूस या अगर आप खुद, किसी के चापलूस हैं तोह नराश न हों यह भी भगवान्-शिष्य का ही एक रूप है।
मसलन जैसे किसी समारोह शादी में अपना चेहरा दिखा देने से आपकी हाजरी लग जाती है वैसे ही एक शनिवार हनुमान के मंदिर से आपको भरपूर शक्ति मिल जाती होगी।1 रूपया देने से 10 लाख भी मिल जाता होगा। ऐसी मान्यता है और किसी को इसपे ऊँगली उठाने का कोई हक़ नहीं। मान्यता निजी मसला है। मूर्ति स्थानक मसला है।
हाल ही में गुजरात के राजकोट में 300 प्रेमियों ने चंदा डाल कर हालिया प्रधान मंत्री माननीय मोदी जी की मूर्ति स्थापित की। हालांकि 2 दिन बाद मोदी जी ने ट्वीट करके आपत्ति जताई, तोह मूर्ति हटा ली गयी। एक मूर्ति के ध्वस्त होने से श्रद्धा कभी ध्वस्त नहीं होती वैसे ही जैसे आशिक़ के जाने के बाद मोहोब्बत दफ़न नहीं होती ।

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दरअसल मेरा मूल, मेरा फ़िक्र इस घटना के बाद का है। मैं एक ऐसे समाज की कल्पना कर रहा हूँ जहां किसी घटनाक्रम पर आपत्ति या उसका सपोर्ट एक ट्वीट मात्र से किया जाएगा। क्या ऐसा भी हो सकता है जब एक दिन इस मुल्क की अदालतें भी ट्वीट से किसी केस पर फैसला सुना दे।
या मेरठ में बैठ हुआ कोई IG एक ज्वेलरी की दूकान में हुयी चोरी की  CCTV फुटेज देख कर चोर को ट्वीट करे “@monu_bir2 you are arrested for theft in jewelry shop. Report to moti nagar police station.”
फिर उसके बाद सारा शेहेर मोनू की ट्विटर पे माँ भेहेन कर दे। यह कैसी साइंटिफिक व्यस्था है के एक नेता अपनी अवाम के इतना ही करीब है के बस ट्विटर पर हर सातवें मिनट में किसी न किसी को बधाई दे देता है या कभी मन करे तोह मन की बात कह देता है, किसी के मन की सुनता चाहे न हो।
दूसरी बात है, मैं सोचता हूँ के अब यह मूर्ति कहाँ होगी या किस हालात में होगी। मुझे नहीं लगता के उसको तोड़ फोड़ कर कहीं फैंक दिया होगा। मुमकिन है के उसको किसी ज्यादा ही चाहवान प्रेमी ने अपने घर पर स्थापित कर लिया है। भई, श्रद्धा तोह यह भी है। या यह भी मुमकिन है के उस मूर्ति को नीलाम करके के बारे में सोचा जा रहा हो। यह भी एक बिज़नस मॉडल हो सकता है और वह भी इंडिया में बना जैसे माननीय मोदी जी ट्वीट करते आये हैं।
खैर, आज तकनीक बहुत आगे बढ़ गयी है। आँखों के आदान प्रदान से अंधापन दूर किया जा सकता है वहीँ दूसरा अंधापन नीच विचार और पछड़ी सोच से आज भी पैर पसार रहा है। आँखें बंद होने से इंसान की फितरत का लेना देना नहीं है। जबके दिमाग का अंधापन श्रद्धा से प्रेरित है और अक्सर सच्चाई से इसका लेना देना नहीं होता।
हम कोशिश कर सकते है, क्योंकि अंधपन अपने साथ साथ डर ले के आता है, के उस उजाले की ओर जाया जाए जहां सच्चाई परवास करती हो और मूर्तियों की जगह इंसान, दूसरे इंसान का बाहें खोल स्वागत करे। ट्वीटर से ज्यादा हम भावनाओं से एक दूजे को समझें। ऐसा वातावरण हो जहां मंगल ,शनि,बुध,ब्रह्पति या तोह ग्रह हों या हफ्ते के दिनों के नाम हों। इसके इलावा जो है, वो श्रद्धा है।
– Gursimran Datla

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