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बज़ारवाद और आम आदमी की जीत

बदलाव”, “Change” और “दौर बदलने” इत्यादि जुमलों से आज एक पार्टी सम्पूर्ण बहुमत से जीत क्या गयी सबने इन जुमलों की माँ बेहेन करनी शुरू कर दी। क्या इश्तहारबाजी और क्या उपभोक्तावाद, सबको खीचने का मानो नया नाम बन गया हो यह “बदलाव का दौर”। अखे, “बदलते दौर” का नाम है हमारा डिश वॉश। तोह कोई कह रहा है के हमारा सीमेंट बदलते भारत की तस्वीर है।
2 – 3 BHK के फ्लैट्स को ‘पीस ऑफ़ माइंड’ की टैगलाइन के नीचे बेचा जा रहा है। खरीददार को भी मोड्यूलर किचन की चिंता है पर पानी की नकासी के प्रबंध की कोई बात नहीं कर रहा। सच्चाई ये है के ऐसे फ्लैट्स और लक्ज़री घरों में अंदर तोह जन्नत बना दी जाती है पर बाहर पानी और गटर की निकासी का कोई प्रबंध नही होता। पता नहीं ऐसे ‘रियल एस्टेट’ में ‘बदलाव’ आएगा के नहीं। मुश्किल है क्योंकि इसमें बिल्डरों का कोई फायदा नहीं है। पर उपभोक्ता को शांति का लालच देकर 18 से 60 लाख की रेंज तक 1-2 BHK बेचा जा रहा है।
वहीँ पर किसी मोटरसाइकिल कंपनी की सीट पर यंग इंडिया लिखा दिखाई दे रहा है तोह कहीं CFL बल्ब से हिन्दुस्तानी भवशिय को रोशन किया जा रहा है। बात होनी चाहिये के क्या यह भी ‘मौकापरस्ती’ नहीं है ? बिजली सस्ती देने की बजाए इस बात को ज्यादा तवज्जों दी जाए के खोलियों, झोपड़ियों में 10 रुपये के बल्ब की जगह 300 की CFL पहुंचाई जाए ? यह कितना जायज़ है और कितनी जरूरत है ? यह कैसी रणनीति है।
उपभोक्तावाद और बाज़ारवाद दोनों ही, सेंसेक्स की तरह गिरता उछलता है। कभी सचिन बाजार का चेहरा थे और बूट से लेकर बूस्ट तक सब बेचते थे। फिर धोनी भी टायर से लेकर वायर तक सब बेचते नज़र आये। आज कल किरकिट की जगह ‘बदलते दौर’ के जुमलों का समय है।
मफलर और स्वेटर इंग्लैंड के सुटों पर भारी पड़ रहा है। हो सकता है आने वाले दिनों में peter england की जगह Raymond फैशन में आ जाये। यह भी हो सकता Black और Numero सदा के लिए हिन्दुस्तानी बाज़ार से चले जाए। मुमकिन है के युवा बिज़नस स्कूलों में खादी और कॉटन पेहेन के जाएँ।
किसी समय शीला दीक्षित की केरला में check-in का मज़ाक बनाता भाजपा दल आज खुद किरण बेदी के लिए spicejet की सस्ती दरों वाली टिकट कराने के चक्कर में हैं। आप देखिये के जिस spicejet की अदालतों में उथल पुथल हो रही है उसने ऐसी पलटी मारी है के ट्रेन से भी सस्ती दरों पर प्लेन की टिकटें दी जा रही हैं। यह भी आज के बाजार का एक स्वरुप है। कुल मिला कर आज का हिन्दुस्तानी बाज़ार ग्लोबल ढांचे में ढलता जा रहा है। मॉल आ गए, नमक, दही, कोई उधार दे कर नहीं राज़ी…
– Gursimran Datla

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