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World cinema & Truck drivers

आज एक ट्रक ड्राईवर से मुलाकात हुयी। पंजाब प्रांत का रहने वाला बेग खड़ी बोली में बोलता है। उसकी कई शिकायतें हैं। उसके 3 बच्चे हैं। यह उसकी शिकायत नहीं है बल्कि माँ समेत 5 लोगों का गुज़र बसर 7 हज़ार रुपये में बहुत मुश्किल से चल पाता है। वह यूनियन में अभी अभी भर्ती हुआ है। इसलिए अभी पक्का नहीं हुआ। “जेहड़े पक्के आ उना दी तन्खा 45 हिजार रपाइये आ” यह उसने बताया। उसके हर शब्द में पंजाब के दोआब इलाके का ह्यूमर खुल के ब्यान हो रहा है। तभी उसकी चाय आ गयी। उसने लेने से मना कर दिया क्योंकि चाय कांच के गिलास में है और गिलास आधा खाली है, अब उसे पूरा गिलास भर के दिया गया है। उसके दाहिने गाल पे एक तिल है जो उसकी सफेदी की और बढ़ रही दादी को दो हिस्सों में चीर रहा है। उसकी उम्र 40 के आस पास की है। उसके चाय की चुस्कियां लेते और बड़बड़ करते मेरे ज़ेहन में अर्जेंटीना की फ़िल्म “las acacias” आई। पैराग्वे से अर्जेंटीना समान लेके जाते ट्रक ड्राईवर ‘रूबेन’ की कहानी। 2011 में आई पाब्लो जिओरजेलि की स्पेनिश भाषा में बनी यह फ़िल्म बड़े ही ठहराओ के साथ चलती है। कल ओस्लो में नोबल प्राइस लेते हुए स्पीच में सत्यार्थी जी जिस sound of silence का वर्णन कर रहे थे, यह फ़िल्म सड़क पर चलते ट्रक ड्राईवर और एक पसेंजर के बीच की चुप्पी की कहानी है।
तभी बेग उठा और चायवाले से एक और मठ्ठी लेने लगा। ‘तें सारे महीने ट्रक च घूमना ऐं, घरवाली कुझ नहीं केहन्दी’? इस से पहले के वह मेरे इस सवाल का जवाब दे पाता,उसका फ़ोन बज पड़ा। बड़े दिनों बाद मैंने नोकिया के पुराने मॉडल और उनकी वही रिंगटोन सुनी। nostalgia!!। वह बहुत जोर जोर से बात कर रहा है। उसकी चाय पर मलाई की परत बन्ने लग पड़ी। nitroglycerine की सप्लाई करने वाले 4 बन्दों की कहानी “the wages of fear”। 1953 में बनी “the wages of fear” हेनरी जॉर्जेस की फ्रेंच थ्रिलर फ़िल्म थी जिसने ट्रक के सफ़र में थ्रिलर को जोड़ा।
‘घरआली ने की कहना, ओह नयाने (बच्चे) संभालदी आ’। क्या करें काम भी तोह करना है के नहीं !! हम्म। साङी ज़िन्दगी ट्रकाँ विच लांग गयी आ। त्रासदी यह रही के सरकार कच्चों को इतनी कम तनखा क्यों देती है। उनके क्या घर नहीं होते ? सारी उम्र एक ही सीट पे गां# टिका के बैठना कितना मुश्किल होता है।
इसी त्रासदी से जुडी है अब्बास कियारोस्तामी की ईरानियन फ़िल्म “Taste of Cherry”। 1997 में बनी इस फ़िल्म में mr. badi अपने ट्रक में बैठ कर आत्महत्या करने निकलता है और एक ऐसे बन्दे की खोज करता है जो उसे दफना सके। बेग के जाने का वक़्त हो गया है। वह शर्ट की उपरली जेब से एक पांच और बाकी 2-2 के सिक्के निकाल के चाय वाले को पकडाता है। और मुझे “चंगा बाई” बोल के निकल जाता है। में भी “चंगा” बोल देता हूँ और मन ही मन उसके सुकून भरे सफ़र के लिए खैर मांगता हूँ। इतने में मेरी चाय के ऊपर भी पर्दा आने लगा है। तभी मुझे पिछले साल आई गुजराती फ़िल्म “the good road” का ख्याल आता है जो ऑस्कर के लिए भी भेजी गयी थी। ज्ञान कॉर्र द्वारा निर्देशित यह फ़िल्म ट्रक ड्राईवर,एक खोये हुए बच्चे और शेहेर की एक लड़की के प्रतिच्छेद की कहानी है। फ़िल्म ठीक ठाक बनी थी पर लोगों में कोई जिज्ञासा न जगा सकी। इसी साल फ़रवरी में आई इम्तियाज़ अली की “हाईवे” भी बहुत सतही ड्रामा था। और यह ट्रक ड्राईवर से ज्यादा उसके साथ किडनैप की कई लड़की की कहानी थी। हिंदी सिनेमा में ट्रक के सफ़र पर कोई उम्दा फ़िल्म नहीं बनी है और बेग सरीखे कई कहानियां बड़े परदे पर उतरने के इंतज़ार में हैं। यह एक बेहतरीन टॉपिक है क्योंकि सफ़र के दौरान यकायक हुए घटनाक्रम लोगों में जिज्ञासा बरकरार रख सकते हैं।
Gursimran Datla

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