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Polish film “Ida”

‘ida’ इस बार के ऑस्कर समारोह में ‘बेस्ट फॉरेन फ़िल्म’ केटेगरी में नामांकित होने वाली पोलिश भाषा की फ़िल्म है।
आश्रमों में पल रही लडकियां जिनके आगे पीछे कोई नहीं, लंबे जीवन को पार करने के लिए धर्म की ओट लेती हैं। ‘इदा’ को नन बन्ने से पहले अपने माँ बाप की कब्र को खोजना है जो विश्व युद्ध में मारे गए थे।
दूसरे विश्व् युद्ध दौरान जब jews का मारा काटा जा रहा था तोह उसी अराजकता के अंजाम के दिनों में एक jew खानदान में पैदा हुयी “इदा” आश्रम से निकल नन बन गयी। पावेल पॉलिकोवस्की द्वारा निर्देशित इसी साल रिलीज़ हुयी यह फ़िल्म 87वें ऑस्कर अवार्ड के लिए प्रबल दावेदार है। फ़िल्म कई प्रमुख फ़िल्म समारोह में बेहतरीन फ़िल्म घोषित हुयी है। मुझे ख़ुशी होगी अगर यह फ़िल्म जीत जाए। फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफी बा-कमाल है और ब्लैक & वाइट दृश्यों से लेस क्रिस्प फ्रेम और कहानी की रफ़्तार पोलैंड के ही महान फिल्मकार केइस्लोस्की की याद दिलाते हैं।
दस्तूर यह है के एक बच्चे के जनम के साथ साथ उसकी ज़ात, उसका मजहब, धर्म, कौम भी जनम ले लेता है। तोह यह कहना गलत होगा के इंसान खाली हाथ आता है।
धर्म थोपा नहीं जा सकता और मजबूरी के समय कन्नी पकड़ा धर्म गाहे बगाहे बोझ बन जाता है। परमात्मा को खुश करने के लिए रूह जलानी पड़ती है और इस तरह धर्म, कई आडम्बरों के सहरे इंसान से भी ऊंचा हो जाता है।
उस अवस्था में जीवन आशामय या संतुष्ट न होकर अन्धकार और खोखली हवा के गुम्बद जैसा व्यतीत होने लगता है। यही “ईदा” फ़िल्म का विष्य वास्तु है और यही ‘इदा’ की दास्ताँ है।
गोया कुछ दिनों में नन की कसम लेने जा रही इदा जब अपने हमउम्र संगीतकार से मिलती है तोह उसके अंदर वैसे ही भाव उत्पन होते हैं जैसे एक आम 19 वर्षिय लड़की के मन में हो हैं। इसी भावना को और पुख्ता कर देती है इदा के एकलौती आंटी, जो उसे कहती है के ‘तुम्हारे बाल इतने सुन्दर हैं, इन्हें ढक कर क्यों रखती हो ?’ भावना धर्म से बड़ी होती है।

यकीन किजीईएगा,  लड़ाई धर्म और अधर्म की दिखती जरूर है, असल में वह इन सब से आगे बढ़ कर आज़ादी और बंधनों की लड़ाई हो जाती है।
पॉवेल इस से पहले इंग्लैंड में फिल्में बनाते रहे हैं और उनकी अपने नेटिव मुल्क पोलैंड में यह पहली फ़िल्म है। मौका लगे तोह जरूर देखिएगा और उन्हें भी दिखायेगा जो सारा जीवन या तोह धर्म की धांदली या दूसरों के धर्म परिवर्तन में निकाल देते हैं।
और ज़रा सोचियेगा के जब हमारे बच्चे हमारी कब्रों तक आएंगे, तोह किसी मज़हब की किताब हमारा हाल नहीं बयां करेगी। कुछ बोलेगी तोह बस वह रास्ते की मिट्टी, और जो हमारी तबाही का एका एक गवाह होगी।
– Gursimran Datla

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