Uncategorized

9000 का कोट

9000 वाला कोट।

आज कल मौलिकता कपड़ों से आती है, और कपड़े, पैसों से आते हैं। 9000 के सूट में आप ज्यादा शानदार, ऊँचे व्यक्तित्व वाले इंसान लगते हैं जब के 900 का सूट मेहेज़ आपका तन ढ़कता है। आप अगर एक ही तरह के कपडे पेहेन कर किसी नियमित इकठ में बार बार जाते हैं तोह यकीनन आप कोई जिज्ञासा नहीं जगा पाते जबके हर बार अलग पोशाक लोगों में आपके प्रति चमक पैदा कर देती है। आप ज्यादा सूझवान और पढ़े लिखे लगते हैं। इसी मौलिकता और सोच समझ ने तमाम फैशन डिज़ाइनरों यॉर्क बने बनाये कपड़ों की दुकानों को सिंगल स्टोरी से मल्टी स्टोरी कर दिया है।

आज कल कुर्ते पयज़ामे या सोबर कपड़ों का दौर खत्म हो गया है। यह इस तरह के कपड़ों को ना पहनने से नहीं हुआ बल्कि ऐसे कपड़ों की कदर ना करने से हुआ है। एक तोह, जीवन आपने आप में ही आगे को अग्रसर होता ही है ऊपर से हमारी पैदाएश भी हमें आगे को और नयी चीज़ें अपनाने को प्रेरित करती है। कहीं भी हमारे जीवन में हमें पुरानी चीज़ें सहेज कर रखने की आदत नहीं सिखाई जाती। मसलन पुराणी सभ्यता, पुराना लिटरेचर, पुरानी कहानियां यहां तक के पुराने देश प्रेमी, पुराने कलाकार, पुरानी इमारतें, इनको सहेजना भी हमारे चित में नहीं डाला गया कभी। पुरातन सभ्यता खो गई, मर गयी उसी का नतीजा है के आज धर्म को ही सभ्यता की थाली में परोस जाता है और ऊपर से आध्यात्मिकता की स्टफ़िंग भी की जाती है। कहीं वह दौर,वह सभ्यता ज़िंदा होती तोह अकल के मारों को पता चलता के कैसे हर गली में हिन्दू मुसलमान से पहले इंसान बस करता था और कितनी शिद्दत से वह रहता था।

पुराने कपडे संदूक में चले जाते हैं,पुराने बुज़ुर्ग, पेटियों वाले कमरे में, और पुरानी किताबें रद्दी में। शहरों में मौजूद पुरानी इमारतें अब स्टोरेज का काम देने लगी हैं। कुछ भूत बंगले बन गए है और कईयों में पुलिस के थाने खुले गए हैं।
कभी अपने घर के बैठक में एक कोने में पड़े पुराने सूटकेस को निकालना। जो समान निकलेगा उसके साथ कुछ वक़्त बीताना, उसको साफ करना। जब उनका इस्तेमाल करते थे,उस वक़्त को याद करना। मैं कहता हूँ, लगाव से बड़ा कोई रिश्ता नहीं। लगाव मौलिकता से भी बड़ा है और 9000 के सूट से भी। लगाव, किसी भी कीमत से कहीं ऊपर है।
पुराने बटन, जो हमारी अम्मा एक छोटी सी डिबिया में संभाल कर रखती थी, किसी खज़ाने से कम नहीं थे वोह। उसमें पिता जी के कोट का एक सुनहरी रंग का कढ़ाई वाला बटन, भाई के कुर्ते का एक सफ़ेद बटन, मेरी लाल कमीज, जो बाद में पॉच बन गयी थी, उस के छोटे छोटे बटन।2 छोटी और 1 बड़ी सुई, कुछ रंग बिरंगे धागे। सब था उस डिबिया में। आज के कोट में वैसे बटन नहीं होते। होते भी हैं जो, वह टूटते नहीं। बटन पिरोने का ज़माना गया।
किसी जमाने में Raymond सबसे हाई क्लास होती थी। पिता जी ने कितनी ही पेंटें Raymond की सिलायीं थी। आज कल 70-80₹ मीटर Raymond का कपडा मिलता है और 200 की jockey की जुराबें हैं। यानि अंदाज़न jockey की बनयान कच्छे, जुराबें और रुमाल की कीमत में Raymond के कपडे का पूरा पेंट शर्ट बन जाता है।
आज मौलिकता Raymond में नहीं है। आज मौलिकता उन ब्रांड से है जिसका नाम भी आप एक बार में ठीक से ना ले सकें। आपको बच्चे आपको ठीक करें के “पाप brand name तोह ठीक लिया करो”। और दोस्त कहें “अबे,घंटे वह गैं है, गैंट नहीं। वोह आज की मौलिकता है।
आम आदमी औसत सोच वाला है। कैसे हो, के उसे लगे के वोह बहुत सूझबूझ वाला, समझदार और well educated है ? बहुत आसान है। उसके आस पास एक औसत समाज की रचना कर दो। उसे गर्व करने के लिए 4-5 फैक्ट दे दो और नारा दे दो के हम सब आगे बढ़ेंगे। मसलन हम औसत से कुछ बेहतर औसत होंगे। पर रहेंगे हम औसत ही। हम 900 के कोट को फैंकेंगे नहीं, ऐसा करेंगे…. उसको अजायबघर में रख देंगे। पर पहनेंगे 9000 वाला ही।
सुहपन, सुंदरता और व्न स्वनता हमारी मौलिकता बनती जा रही है।
ज्ञान, चेतना और भावना…यह तीनों, बिमारी का बहाना करके छुट्टी की अर्जी लिख के बहुत दूर चले गये हैं।
अब सुना है के –
         ज्ञान ने, 9000 वाला कोट ले लिया है।
         चेतना को, कुछ धर्म का प्रचार करने वाले ले     गए।
और
          भावना का, सिनेमा बनाने वाले बेदर्दी से  इस्तेमाल कर रहे हैं।
– Gursimran Datla

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s