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An open letter to Andrei Tarkovsky

महान रूसी फिल्मकार आंद्रेई तारकोवस्की के नाम एक खुला ख़त

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प्रिय आंद्रेई,

सिनेमा की दुनिया में तुम्हें एक आत्मिक और आध्यात्मिक फिल्मकार के रूप में देखा जाता है। लोग जिन फिल्मकारों से प्रेरणा लेते हैं, वह फिल्मकार भी तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।सपनों को जस का तस सिलोलाइड पर रचने का हुनर सिर्फ तुम्हारे पास ही था। मुझे बड़े दुःख के साथ तुम्हें अवगत कराना पड़ रहा है के मैं एक ऐसे मुल्क से तुम्हें ख़त लिख रहा हूँ, जहां अध्यात्मिकता को धक्को धक्की धर्म से जोड़ा जाता है। यहां पर धर्म जीवन से ऊपर है और जनम से पहले ही हमारी ज़ात,मजहब,कुनबा तय हो जाता है। परम्परा के नाम पर बच्चे को कई इंसानों, मूर्तियों, किताबों अथवा निशानों के आगे झुकने को कहा जाता है। यह पक्का किया जाता है के 18 साल तक कोई भी इंसान यहां अपनी आत्मिकता से न जिए, बल्कि माँ-बाप का कहना माने और 18 के बाद उसे समाजिक सरोकारों को जी कहकर मानने का पाठ पढ़ाया जाता रहा है। कोई कोई ही मिलेगा जिसने कभी जीवन का फैसला स्वयं लिया हो। यहां अध्यात्मिकता तोह 50 की उम्र निकल जाने के बाद शुरू होती है। जब परम्परा की चाशनी में डूबा बेटा बाप को घर निकाला दे देता है और मजबूरन बाप के पास अध्यात्मिकता के इलावा कोई और चारा नहीं रह जाता।
“मेरे लिए तारकोवस्की महान है। उसने नयी भाषा को जनम दिया। उसने सिनेमा को उसके मूल रूप में प्रस्तूत किया। उसने सिनेमा को जीवन के आईने की तरह इस्तेमाल किया। और सपने की तरह परदे पर उतारा।” – इंगमार बर्गमैन
बर्गमैन के यह शब्द तुम्हारी परिभाषा हैं क्योंकि तुमने सिनेमा को बाकी कलाओं से ऊपर रखा और इस कला को इज़्ज़त दी। तुम्हें पता है जब पहली बार मैं “आंद्रेई रुबलेव” फ़िल्म से रूबरू हुआ तोह मेरे मन में क्या उठा ? मेरा दिल किया के इस फ़िल्म के हर फ्रेम को निकाल के उसे लकड़ी के फ्रेम में जड़ा कर अपने चारो तरफ लगा दूँ। मैंने तुम्हारी फिल्मों को बच्चों की तरह देखा। उसमें मीन मेख नहीं निकाले और ना ही तुम्हारी तकनीक की तरफ कोई ध्यान दिया। इसलिए मुझे पता ही नहीं के तुम्हारी फिल्में कैसी होती हैं। कोई मुझसे पूछता है के तुम्हारी फ़िल्म कैसी है ? तोह मैं कह देता हूँ “ज़िन्दगी जैसी”।

यहां पर ऐसा नहीं है। यहाँ सिनेमा जीवन नहीं  है, बल्कि उसका एक छोटा सा हिस्सा है जिसका मकसद मनोरंजन मात्र है। यह भी एक कारण हो सकता है के 100 साल लंबे हमारे मुल्क के सिनेमा से अभी तक तुम्हारे आस पास का भी कोई फिल्मकार नहीं निकला। यहां फ़िल्म नैपकिन पेपर की तरह है। इस्तेमाल करो और फैंक दो। लोग सिनेमा से थकावट मिटाते हैं तोह यहां के फिल्मकारों ने सिनेमा को मनोरंजक बना दिया। वैसे नकलीपन और होछेपन से उनको मेहनत भी कम करनी पड़ती है। दिमाग भी नहीं लगाना पड़ता। और बिना दिमाग की फिल्में यहां करोडों कमातीं हैं।

तुम्हारा यह कहना बिलकुल दरुस्त था के कला किसी को कुछ नहीं सिखाती। अगर सिखाती होती तोह पिछले 4000 सालों में मानवता बहुत कुछ सीख लेती। पर नहीं, यह वहीँ की वहीँ खड़ी है। अब कला चापलूसी का रूप अख्तयार चुकी है जो दूसरों को इम्प्रेस करने के काम आती है। हम सभी प्रभाव छोड़ना चाहते हैं। नकलीपन से ही सही, पर लोगों की जुबान पर हमारा नाम होना चाइये। ऐसी सोच हमें कहीं नहीं लेजाती।
“धरती पर मृत्यु का कोई अस्तित्व नहीं
सब अमर हैं। सब अमर है।
मृत्यु से डरने की कोई जरूरत नहीं।
ना 17 की उम्र में ना 70 की उम्र में।
यहां सच्चाई और रौशनी का अस्तित्व है
मृत्यु और अँधेरे का नहीं।”
आपके पिता द्वारा लिखी गयी उपरोक्त सत्रों को जब भी मैं पढता हूँ, मेरे अंदर भविष्य का सारा डर चला जाता है। मैं वापिस इस मौजोदा समय में लौट आता हूँ। और ज़िन्दगी एक खूबसूरत तोहफा लगने लगती है।
तुमने, तुम्हारे विचारों ने, तुम्हारी फिल्मों ने मुझे भरपूर हिम्मत,ताकत और शिक्षा दी है जो सदेव मेरे साथ रहेगी। तुम्हें लिखने को मेरे पास शब्दों का खजाना है पर यहां पर, लोगों के पास पढ़ने का समय नहीं है। सो इसी वादे के साथ के तुम्हारे इस ख़त के जवाब के बाद और ख़त लिखूंगा, मैं तुमसे विदा लेता हूँ।
आशा है, तुम जहां भी होगे, अकेले होगे और खुद में होगे। इस अवस्था में होने का आनंद मैं भी जानता हूँ। हा हा….

तुम्हारा दोस्त,
गुरसिमरन दातला।

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